सोमवार, 1 अक्तूबर 2012

गाँधी एक सागर हैं


गाँधी एक सागर हैं 
स्थिर गहरा पुरातन ,
 चाहे तो शंख सीपी घोंघे 
लेकर लौट सकते है ,पर वह है ,
रामराज्य का उद्घोष कर मोती उलीचता हुआ !
गाँधी एक सागर हैं 
लहराता हुआ प्रशांत 
सत्य की गर्जना करता अविरल 
पीढ़ियों को आकर्षित करता 
संवारता दुलारता जीवन देता हुआ !
गाँधी एक सागर हैं 
अपने में समेटे पूरी दुनिया 
सत्य अहिंसा बन्धुत्व से भरा 
दृढ  निश्चय शक्ति पुंज से 
पाप अन्याय और बुराइयों को धकेलता हुआ !
गाँधी एक सागर हैं 
साहित्यिक सत्ता हैं 
बेबसी लाचारी के कारण ढूंढ़ता
विचारों में तूफान उठाता
शक्ति देता ,नस नस में रक्त बन बहता हुआ !
गाँधी एक सागर है 
शीतलता देते, शांति के दूत 
आसमानी चादर ओढ़े समय खोंसे
लहर का डंडा थामें दूर देखता 
अभय वर देता भजन दुहराता हुआ !
गाँधी एक सागर हैं 
अनगिनत परतें लिए 
औदार्य,उपवास ,सत्याग्रह 
डेढ़ पसली में अनंत भर 
धरती से उठ आसमां से हाथ मिलाता हुआ !
गाँधी एक सागर हैं 
आज गाँधी एक प्रश्न हैं 
नींद बेहोशी काहिली पर 
भ्रष्टाचार शोषण से दुखी 
अपने ही किनारों पर पछताता हुआ !
दम तोड़ता हुआ गाँधी एक सागर हैं !!


दोस्तों !  मेरी ये कविता 23 अक्टूबर 2009 मे  अमर उजाला मे छपी थी ! 


4 टिप्‍पणियां:

  1. आज गाँधी एक प्रश्न हैं
    नींद बेहोशी काहिली पर
    भ्रष्टाचार शोषण से दुखी
    अपने ही किनारों पर पछताता हुआ !
    दम तोड़ता हुआ गाँधी एक सागर हैं !!

    बेहतरीन कविता ...विचारणीय भाव

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  2. सागर के समान ही है गांधी का चरित्र ..... मोती ढूँढना आना चाहिए सुंदर रचना

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  3. आज गांधी होते, तो बहुत दुखी होते।

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  4. आज गाँधी एक प्रश्न हैं
    नींद बेहोशी काहिली पर
    भ्रष्टाचार शोषण से दुखी
    अपने ही किनारों पर पछताता हुआ !
    दम तोड़ता हुआ गाँधी एक सागर हैं !!

    आज की परिस्थतियां सचमुच ऐसी है, सुंदर रचना.

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