सोमवार, 17 सितंबर 2012

छोड़े हुए रास्ते

                                 छोड़े हुए रास्ते 


    कदम तो 
    सहज और स्फूर्त होते हैं ,
    क्यों हो जाते हैं अमिट और भारी,
    उनके निशान  |

   मीलों चल के भी 
   मन ही मन 
   लौट आने की इच्छा होती है |

   कुछ छूट तो नहीं गया 
  अनजाने में ,
  जुड़ तो नहीं गया अनायास ही |

  छोड़े हुए रास्ते तो ,
  वहीं वैसे ही होते हैं ,
  क्यों हो जाता है मुश्किल

  एका एक लौट पाना |   

12 टिप्‍पणियां:

  1. जाने पहचाने रास्तों पर चलें या नयी राह जियें..

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    1. रास्ते कब बदल जाते हैं पता ही नही चलता ! धन्यवाद प्रवीन जी !

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  2. छोड़े हुए रास्ते तो ,
    वहीं वैसे ही होते हैं ,
    क्यों हो जाता है मुश्किल.

    सच है जो डगर एक बार छूट जाती है वह राह दुबारा पकडना आसान नहीं. वैसे आपतो फिर वापस आ ही गयी.

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    1. सच में रचना जी हम आ ही गये ! बहुत बहुत धन्यवाद ! आप सबका साथ कितना अच्छा है !

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  3. छोड़े हुए रास्ते तो ,
    वहीं वैसे ही होते हैं ,
    क्यों हो जाता है मुश्किल

    वापसी मुश्किल तो होती ही है..... चाह हो तो राह भी बने..... सुंदर पंक्तियाँ लिखी हैं.....

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    1. धन्यवाद मोनिका जी ! चाह हो तो राह बन ही जाती है !

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  4. गहन भाव लिए बेहतरीन प्रस्‍तुति।

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  5. रास्ते तो वही होते हैं पर मन बदल जाता है इंसान का ...
    गहरी बात ...

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    1. जी बिलकुल ! परिस्थितियाँ बदलती हैं तो मन भी बदल जाता है ! पर रास्ते भी समय के प्रभाव से अछूते कहाँ रहते हैं ! धन्यवाद !

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  6. बहुत खुबसूरत प्रस्तुति |
    बधाइयां -

    कुछ पंक्तियाँ
    सादर

    छोड़े हुए रास्ते तो ,
    वहीं वैसे ही होते हैं ,
    क्यों हो जाता है मुश्किल

    एका एक लौट पाना |
    .............बेहतरीन अभिव्‍यक्ति

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