रविवार, 29 जनवरी 2012

मेरा कन्धा

मेरा कन्धा


मेरी बेटी के लिए
दुनिया को देखने का
मुंडेर है मेरा कंधा !

झाँका करती है ,
सिर टिकाये
पीला सूरज,खिलते गुलाब
पंख फड़फड़ाती चिड़िया ,
गुटरगूं करते कबूतर
देखती है यकीन करती है
चूमती है मेरा कंधा !



मेरी बेटी के लिए
दुनियादारी में
उतरने की सीढ़ी है मेरा कंधा !

सच है या झूठ
कैसी है यह दुनिया
सरसों के फूलों में
आर्जीमोन के फूल मिल गये ,
दुविधा के शूल चुभ गये
पर काँटों के खेत में मेड़ है मेरा कंधा !

मेरी बेटी के लिए
प्रेम है आस्था है जिद है ,
और जो कुछ भी है ,
बस इतना समझ लीजिये कि
सच कि दहलीज है मेरा कंधा !

स्वार्थों के जंगल में पगडंडी है ,
लहूलुहान होते बयान करता है ,
कवि का दुःख भोगता है ,
क्योंकि प्रश्नों के मेघ में
क्षितिज है मेरा कन्धा !

मेरी बेटी के लिए
दुनिया को देखने का
मुंडेर है मेरा कंधा ! !