मंगलवार, 22 नवंबर 2011

रुई के व्यापारी

धरती से दूर आसमान में
सफेद बादलों के बीच रहते हैं
रुइयों के थोक व्यापारी !

यहाँ देखो न, रुई ही रुई ,
कौन कातेगा इनके सूत
और बना देगा गुड्डे गुडिया
छोटे मझोले बड़े बड़े जीव !
पर वे रचते हैं रुइयों से
खिलौने, और भर देते हैं ,
छोटे छोटे सांसों के तार !
सांसों में तड़प थोडा सा प्यार !

खेल के लोभ उतर जाते हैं
ये संसार के समुन्दर में ,
भोले भाले जुट जाते हैं
तरह तरह के खेल में,
गीली हो जाती है देह की रुई
फिर डरते हैं , घबराते हैं ,
और यहीं मात खा जाते हैं !

बहुत दूर है उनका आसमान
समझते हैं ,जानते हैं कि
अब वे कभी नही उड़ पाएंगे
रुई होने की कोशिश में
उनके सारे इंधन चुक जायेंगे
रुई को देखते ही उन्हें
आसमान याद आता है ,
वह बेतरह छटपटाता है

कैसी है ये कारीगरी ,
जाने कहाँ छुप गये ,
वे खिलौनों के कारीगर
वे थोक रुइयों के व्यापारी !

9 टिप्‍पणियां:

  1. बादलों की रुई से स्वप्न बुने जा सकते हैं, कातने वाला कलाकार चाहिये।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. प्रवीन जी आपने बहुत सही बात कही ! धन्यवाद !

      हटाएं
  2. रुई के बिम्ब लिए हुए बहुत सुंदर रचना आभार

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रवीण जी ने सही कहा है ..सुन्दर प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत खूब .. बादलों के बीच अब ये रूई के व्योपारी भी खो गए हैं ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. अच्‍छा बिम्‍ब लिया है आपने। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  6. थोक व्यापारी नज़र नहीं आते ।
    ..सुंदर बिंब के सहारे अच्छी अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  7. आप सबने कविता को पसंद किया और अपने बहुमूल्य टिप्पणियों से सजाया आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं