रुई के व्यापारी
धरती से दूर आसमान में
सफेद बादलों के बीच रहते हैं
रुइयों के थोक व्यापारी !
यहाँ देखो न, रुई ही रुई ,
कौन कातेगा इनके सूत
और बना देगा गुड्डे गुडिया
छोटे मझोले बड़े बड़े जीव !
पर वे रचते हैं रुइयों से
खिलौने, और भर देते हैं ,
छोटे छोटे सांसों के तार !
सांसों में तड़प थोडा सा प्यार !
खेल के लोभ उतर जाते हैं
ये संसार के समुन्दर में ,
भोले भाले जुट जाते हैं
तरह तरह के खेल में,
गीली हो जाती है देह की रुई
फिर डरते हैं , घबराते हैं ,
और यहीं मात खा जाते हैं !
बहुत दूर है उनका आसमान
समझते हैं ,जानते हैं कि
अब वे कभी नही उड़ पाएंगे
रुई होने की कोशिश में
उनके सारे इंधन चुक जायेंगे
रुई को देखते ही उन्हें
आसमान याद आता है ,
वह बेतरह छटपटाता है
कैसी है ये कारीगरी ,
जाने कहाँ छुप गये ,
वे खिलौनों के कारीगर
वे थोक रुइयों के व्यापारी !
बादलों की रुई से स्वप्न बुने जा सकते हैं, कातने वाला कलाकार चाहिये।
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रवीन जी आपने बहुत सही बात कही ! धन्यवाद !
हटाएंरुई के बिम्ब लिए हुए बहुत सुंदर रचना आभार
प्रत्युत्तर देंहटाएंबेमिसाल राचन ...बेहतरीन बिम्ब
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रवीण जी ने सही कहा है ..सुन्दर प्रस्तुति
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत खूब .. बादलों के बीच अब ये रूई के व्योपारी भी खो गए हैं ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंअच्छा बिम्ब लिया है आपने। बधाई।
प्रत्युत्तर देंहटाएंथोक व्यापारी नज़र नहीं आते ।
प्रत्युत्तर देंहटाएं..सुंदर बिंब के सहारे अच्छी अभिव्यक्ति।
आप सबने कविता को पसंद किया और अपने बहुमूल्य टिप्पणियों से सजाया आपका बहुत बहुत धन्यवाद !
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