मंगलवार, 20 सितंबर 2011

यहीं कहीं.....

कभी आते हो तुम
यों ही हडबडी में ,
अतिरिक्त दुःख से उदासीन
कुछ ढूंढते कुछ पूछते ;
गहरी ख़ामोशी ओढ़े !
बहुत दिन बीत जाते हैं
बिना किसी सुख के
दरक ही जाते हैं ...
दुःख भी !
कहीं कुछ भी तो नहीं
छीज जाते हैं झगड़े भी !
तुम नहीं जानते
मैं नहीं मानती
क्योंकि दीखता नहीं
पर प्यार है
यहीं कहीं ..................!

16 टिप्‍पणियां:

  1. वाह...लाजवाब...बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  2. "बहुत दिन बीत जाते हैं
    बिना किसी सुख के "
    !!!!!!!!!!!!!!!!!!! लाजवाब !!!
    मै चकित हूँ !!!!!!!!!

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  3. बहुत दिन बीत जाते हैं
    बिना किसी सुख के
    दरक ही जाते हैं ...
    दुःख भी !
    दरक जाते हैं दुःख भी !इसके प्रति भी एक उदासीनता है !
    एक अनमनी सी सी उदास सी बेहद पहचानी हुई कविता है . तुम्हें बधाई !

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  4. बहुत ही हृदयस्पर्शी भावाभिव्यक्ति....

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  5. ब्लॉग से दूर रहना दुखी करता है ,पर आप सबका इतना प्यार और साहस देना सब दुःख दूर कर देता है ! आप सबका हार्दिक अभिनंदन करती हूँ ! बहुत बहुत धन्यवाद !

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  6. प्यार तो होता ही है ... रूठने और मनाने लें .. बिखरा रहता हजी आस पास अनजाने ही जो नज़र नहीं आता ... इस उदासी से बाहर आना अच्छा है ...

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  7. कहाँ थी अब तक आप ???? बड़ी लंबी ख़ामोशी के बाद आई... भी तो प्यार के होने का अहसास और न होने के दुःख के जज्बात के साथ. अच्छा लगा इतने लंबे अंतराल के बाद आपको पढ़ना

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  8. इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकार करें.

    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारने का कष्ट करें .

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  9. कमाल का लेखन है.....यह गतिमान रहिए ...बधाई

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