मंगलवार, 20 सितंबर 2011

यहीं कहीं.....

कभी आते हो तुम
यों ही हडबडी में ,
अतिरिक्त दुःख से उदासीन
कुछ ढूंढते कुछ पूछते ;
गहरी ख़ामोशी ओढ़े !
बहुत दिन बीत जाते हैं
बिना किसी सुख के
दरक ही जाते हैं ...
दुःख भी !
कहीं कुछ भी तो नहीं
छीज जाते हैं झगड़े भी !
तुम नहीं जानते
मैं नहीं मानती
क्योंकि दीखता नहीं
पर प्यार है
यहीं कहीं ..................!