शनिवार, 18 जून 2011

एक उतरती साँझ में

एक उतरती साँझ में ,
उदास गंगा के किनारे ,
प्रति बिम्बित परछाइयों में ,
ढुलक गया वह बड़ा मोती !

बीत रही अठखेलियाँ
खो गई अब रौशनी
बुझ रहे थे रंग पल पल
बांधता इक नांव आखिरी !


मोती नही वह चाँद था
जिसमे सजा था घर हमारा
छलकता था स्नेह जल से
जाने कब रेत हो गया !


उड़ गये पांखी उडान भरते ,
सो गये वे, दे दंश शूलों के
छोड़ते हैं किनारे भी अब साथ
इस उतरती साँझ में !

12 टिप्‍पणियां:

  1. मोती नही वह चाँद था
    जिसमे सजा था घर हमारा
    छलकता था स्नेह जल से
    जाने कब रेत हो गया !

    बहुत संवेदनशील अभिव्यक्ति

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  2. गहन सम्वेदनात्मक रचना

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  3. उड़ गये पांखी उडान भरते ,
    सो गये वे, दे दंश शूलों के
    छोड़ते हैं किनारे भी अब साथ
    इस उतरती साँझ में !

    प्रभावित करती संवेदनशील , गहन अभिव्यक्ति.....

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  4. मोती नही वह चाँद था
    जिसमे सजा था घर हमारा
    छलकता था स्नेह जल से
    जाने कब रेत हो गया !

    अत्यंत संवेदनशील सांझ के धुंधलके से झांकती कोमल रचना.

    काफी समय बाद ब्लॉग पर आना हुआ. व्यस्तता अधिक थी क्या?

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  5. आदरणीय संगीता स्वरूप जी ,ऍम वर्मा जी ,डा. मोनिका और प्रवीन जी,और रचना जी ! आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद ! हाँ बहुत दिनों के बाद ब्लॉग पर आना हुआ ! कुछ घरेलू व्यस्तता थी ,और कुछ कहानियों की ओर मुड गई थी !
    पर आप लोंगो का प्यार पा के निहाल हो गई हूँ ! आप लोंगो की कविताओं से दूर रही यही कष्ट था !

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  6. मोती नही वह चाँद था
    जिसमे सजा था घर हमारा
    छलकता था स्नेह जल से
    जाने कब रेत हो गया !

    भावनाओं का बहुत सुंदर चित्रण . ...बधाई.

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  7. बहुत संवेदनशील अभिव्यक्ति ...बधाई.

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  8. बेहद खूबसूरत और संवेदनशील अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  9. बीत रही अठखेलियाँ
    खो गई अब रौशनी
    बुझ रहे थे रंग पल पल
    बांधता इक नांव आखिरी !

    kitni gehri anubhti ..man ko chu gayi ...bahut umda rachna .........aabhar

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