शनिवार, 18 जून 2011

एक उतरती साँझ में

एक उतरती साँझ में ,
उदास गंगा के किनारे ,
प्रति बिम्बित परछाइयों में ,
ढुलक गया वह बड़ा मोती !

बीत रही अठखेलियाँ
खो गई अब रौशनी
बुझ रहे थे रंग पल पल
बांधता इक नांव आखिरी !


मोती नही वह चाँद था
जिसमे सजा था घर हमारा
छलकता था स्नेह जल से
जाने कब रेत हो गया !


उड़ गये पांखी उडान भरते ,
सो गये वे, दे दंश शूलों के
छोड़ते हैं किनारे भी अब साथ
इस उतरती साँझ में !