सोमवार, 21 मार्च 2011

चांदनी

हिय में उतरी चांदनी जो
मन को जलाती भी रही ,
और जुडाती भी रही !!
पीड़ा है मेरी वह,
समझाती भी रही
और डराती भी रही !!
चन्दन बन घुल गयी जो ,
सर्प की तरह लिपटी भी रही ,
गंध सी मुक्तवाही भी रही !
पीड़ा है मेरी वह ,
उलझाती भी रही ,
सुलझाती भी रही !!
बदली सी छा गयी जो ,
आँखों में उमड़ती भी रही
और बरसती भी रही !!
पीड़ा है मेरी वह
डुबोती भी रही ,
तैराती भी रही !
यादों नें घेर लिया जो ,
चलचित्रों में हँसातीभी रही
और रुलाती भी रही !!
पीड़ा है मेरी वह ,
रागी भी रही ,
बैरागी भी रही !!

24 टिप्‍पणियां:

  1. चलचित्रों में हँसातीभी रही
    और रुलाती भी रही !!
    पीड़ा है मेरी वह ,
    रागी भी रही ,
    बैरागी भी रही !! ....

    बहुत ही कोमल भावनाओं में रची-बसी
    इस खूबसूरत रचना के लिए
    आपको हार्दिक बधाई।

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  2. पीड़ा के कितने स्वरूप, बहुत ही सुन्दर कविता।

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  3. आपने तो पीड़ा को पुरी तरह से जी लिया है ..बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति

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  4. शरद जी प्रवीन जी संगीता जी और राजेश जी ! आपका सबका बहुत बहुत धन्यवाद !

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  5. चाँदनी के इतने रूप !!! लाजवाब !!!!!
    ''रागी भी रही ,
    बैरागी भी रही !!''....दोनों सवेदनाओं का संतुलन !!!!
    बहुत बहुत मुश्किल चीज़ को तुमने रचा है ... बधाई !

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  6. धन्यवाद सुशीला ! भावनाओं का युद्ध दुनिया का सबसे बड़ा युद्ध है ! ऐसा मै मानती हूँ !

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  7. और रुलाती भी रही !!
    पीड़ा है मेरी वह ,
    रागी भी रही ,
    बैरागी भी रही
    अंतर्मन के कितने भाव ..... दर्द के कितने रूप .... बहुत सुंदर

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  8. पीड़ा है मेरी वह ,
    रागी भी रही ,
    बैरागी भी रही !!
    ... pidaa ke kai roop , bahut badhiyaa

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  9. अच्छा लगा पीड़ा को यूँ सहेजना और उसका बखान करना

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  10. आधुनिक अंग्रजी आलोचना की शब्दावली में साहित्य को ”पैराडाक्स” कहा गया है . इसका एक सटीक एवं सही उदाहरण पेश कर रही है आपकी ये पंक्तियां.
    अनुभुतियों के गहन कानन में ऋजु निष्कर्षों का खो जाना भी आपने आप में एक निष्कर्ष ही है ....

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  11. चलचित्रों में हँसातीभी रही
    और रुलाती भी रही !!
    पीड़ा है मेरी वह ,
    रागी भी रही ,
    बैरागी भी रही !!

    Sunder rachna ke liye Badhai 'Badi Maa'

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  12. aap apni peeda me doob utra rhi hai yha humsaman ki uthaptk me pidit huye ja rhe hai . jra shift ho jaun to fir toulte hai is peeda puran ko .
    bhut sundar kvita .

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  13. धन्यवाद मोनिका ,रश्मि प्रभा जी रचना जी ! और कंवर कुसुमेश जी ! आपने मेरा हौसला बढ़ाया !अभिषेक जी आपने कविता को बहुत सही समझा ! वास्तव में जिन्दगी बहुत अनगढ़ है !आपकी बात मुझे बहुत अच्छी लगी ! अमरेन्द्र और राज जी ! आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

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  14. usha di
    bahut hi sundar komal bhavo se saji aapki kavita ne peeda ke saare rang apne prabhav -purn sabdo me samet liye hai .
    gahan anubhuti se purn aapki rachna dilko chhoo gai.
    bahut bahut badhai
    poonam

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  15. पीड़ा है मेरी वह
    रागी भी रही बैरागी भी रही...
    ..वाह! पीड़ा में राग-बैराग दोनो को योगी ही महसूस कर सकता है। सुंदर भाव।

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  16. पहली बार आपके ब्लॉग पर आया अच्छा लगा
    अच्छा लगा पीड़ा को यूँ सहेजना और उसका बखान करना

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  17. संवेदना के विभिन्न् पहलुओं को आपने अपनी कविताओं में पूरी सच्चाई से उजागर किया है।बहुत ही सुंदर कविता आभार। मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है।

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  18. क्या आप हमारीवाणी के सदस्य हैं? हमारीवाणी भारतीय ब्लॉग्स का संकलक है.


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  19. पीड़ा के बहु स्वरूप, बहुत ही सुन्दर कविता।
    सुन्दर भावाभिव्यक्ति
    आपको हार्दिक बधाई।

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