सोमवार, 21 मार्च 2011

चांदनी

हिय में उतरी चांदनी जो
मन को जलाती भी रही ,
और जुडाती भी रही !!
पीड़ा है मेरी वह,
समझाती भी रही
और डराती भी रही !!
चन्दन बन घुल गयी जो ,
सर्प की तरह लिपटी भी रही ,
गंध सी मुक्तवाही भी रही !
पीड़ा है मेरी वह ,
उलझाती भी रही ,
सुलझाती भी रही !!
बदली सी छा गयी जो ,
आँखों में उमड़ती भी रही
और बरसती भी रही !!
पीड़ा है मेरी वह
डुबोती भी रही ,
तैराती भी रही !
यादों नें घेर लिया जो ,
चलचित्रों में हँसातीभी रही
और रुलाती भी रही !!
पीड़ा है मेरी वह ,
रागी भी रही ,
बैरागी भी रही !!