आये हैं लडके शहर में देने परीक्षा !
उन्हें भविष्य नजर नहीं आता ! !
हर कदम है नियम कानून उन्हें,सडक पर चलना नहीं आता ! !
बेकारी के बोझ, बेरुखी से परेशान!
उन्हें अलग से दिखना नहीं आता !!
बैठ गयी है धांधली जो आफिसों में ,
जमाने का रफ्तार समझ नहीं आता ! !
रफ्तार जो दरकिनार करती है उन्हें !
बैठ गये रेल पर और अब कुछ नहीं सुहाता !!
उठो देश के जवानो, लुटेरों को बेनकाब करो !
हक जिसने लूटा है उससे अपना हिसाब करो !!
आज के ये लुटेरे अब लुटेरे नही दरिन्दे हो गए हैं और नव जवानों के पास आपसे में ही लड़ने से फुर्सत कहाँ जो एक जुट हो कर एक ही पायदान पर खड़े हो सकें सराहनीय प्रस्तुति
प्रत्युत्तर देंहटाएंदुर्भाग्य पूर्ण घटना।
प्रत्युत्तर देंहटाएंदर्दनाक! शर्मनाक! एक झकझोरने वाला सत्य उद्घटित किया है-आपने।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसजीव प्रस्तुति के लिए साधुवाद!
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कहाँ मचा कोहराम नहीं।
है इलाज आराम नहीं॥
कहने को हुक्काम बहुत-
युवा हाथ को काम नहीं॥
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सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी
शर्मनाक घटना
प्रत्युत्तर देंहटाएंअफसोसजनक हादसा ...... अब तो हिसाब करना ही होगा ... सार्थक रचना
प्रत्युत्तर देंहटाएंसार्थक और सशक्त रचना, आभार.
प्रत्युत्तर देंहटाएंआप को वसंत पंचमी की ढेरों शुभकामनाएं!
सादर,
डोरोथी.
आज की सबसे दर्दनाक और ज्वलंत समस्या को विषय बना कर जो कुछ आपने इस रचना के माध्यम से कहा है झझकोर देता है !
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपने ब्लॉग पर आकार जो प्रोत्साहन दिया है उसके लिए आभारी हूं
प्रत्युत्तर देंहटाएंbahut sunder chitran badhai
प्रत्युत्तर देंहटाएंhttp://unluckyblackstar.blogspot.com/2011/02/blog-post_10.html
दुर्भाग्य पूर्ण घटना।
प्रत्युत्तर देंहटाएंRelevent and inspiring one. Would Like to follow U.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत ही गम्भीर समस्या पर लेखनी चलाई है आपने!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंवृक्षारोपण : एक कदम प्रकृति की ओर said...
डॉ. डंडा लखनवी जी के दो दोहे
माननीय डॉ. डंडा लखनवी जी ने वृक्ष लगाने वाले प्रकृतिप्रेमियों को प्रोत्साहित करते हुए लिखा है-
इन्हें कारखाना कहें, अथवा लघु उद्योग।
प्राण-वायु के जनक ये, अद्भुत इनके योग॥
वृक्ष रोप करके किया, खुद पर भी उपकार।
पुण्य आगमन का खुला, एक अनूठा द्वार॥
इस अमूल्य टिप्पणी के लिये हम उनके आभारी हैं।
http://pathkesathi.blogspot.com/
http://vriksharopan.blogspot.com/
परिवर्तन सत्य है लेकिन इस पर से मुखौटा उठाने वालो इमानदार हाथो को आगे आने की जरुरत है . इस कविता के माध्यम से आज के सामयिक परिवेश पर करारी चोट की है आपने .
प्रत्युत्तर देंहटाएंashishkriti.blogspot.com .
बैठ गयी है धांधली जो आफिसों में ,
प्रत्युत्तर देंहटाएंजमाने का रफ्तार समझ नहीं आता !
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एक तीखा सच लिखा है तुमने !
सत्यता को उदघाटित करती आपकी सार्थक रचना के लिए आपको बधाई!
प्रत्युत्तर देंहटाएंयथार्थ.
प्रत्युत्तर देंहटाएंआशीष
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लम्हा!!!
नेह और अपनेपन के
प्रत्युत्तर देंहटाएंइंद्रधनुषी रंगों से सजी होली
उमंग और उल्लास का गुलाल
हमारे जीवनों मे उंडेल दे.
आप को सपरिवार होली की ढेरों शुभकामनाएं.
सादर
डोरोथी.