सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

हिसाब करो




आये हैं लडके शहर में देने परीक्षा !
उन्हें भविष्य नजर नहीं आता ! !
हर कदम है नियम कानून उन्हें,
सडक पर चलना नहीं आता ! !
बेकारी के बोझ, बेरुखी से परेशान!
उन्हें अलग से दिखना नहीं आता !!
बैठ गयी है धांधली जो आफिसों में ,
जमाने का रफ्तार समझ नहीं आता ! !
रफ्तार जो दरकिनार करती है उन्हें !
बैठ गये रेल पर और अब कुछ नहीं सुहाता !!
उठो देश के जवानो, लुटेरों को बेनकाब करो !
हक जिसने लूटा है उससे अपना हिसाब करो !!

17 टिप्‍पणियां:

  1. आज के ये लुटेरे अब लुटेरे नही दरिन्दे हो गए हैं और नव जवानों के पास आपसे में ही लड़ने से फुर्सत कहाँ जो एक जुट हो कर एक ही पायदान पर खड़े हो सकें सराहनीय प्रस्तुति

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  2. दर्दनाक! शर्मनाक! एक झकझोरने वाला सत्य उद्घटित किया है-आपने।
    सजीव प्रस्तुति के लिए साधुवाद!
    ------------------------------
    कहाँ मचा कोहराम नहीं।
    है इलाज आराम नहीं॥
    कहने को हुक्काम बहुत-
    युवा हाथ को काम नहीं॥
    ---------------------------------
    सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

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  3. अफसोसजनक हादसा ...... अब तो हिसाब करना ही होगा ... सार्थक रचना

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  4. सार्थक और सशक्त रचना, आभार.
    आप को वसंत पंचमी की ढेरों शुभकामनाएं!
    सादर,
    डोरोथी.

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  5. आज की सबसे दर्दनाक और ज्वलंत समस्या को विषय बना कर जो कुछ आपने इस रचना के माध्यम से कहा है झझकोर देता है !

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  6. आपने ब्लॉग पर आकार जो प्रोत्साहन दिया है उसके लिए आभारी हूं

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  7. bahut sunder chitran badhai
    http://unluckyblackstar.blogspot.com/2011/02/blog-post_10.html

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  8. बहुत ही गम्भीर समस्या पर लेखनी चलाई है आपने!!


    वृक्षारोपण : एक कदम प्रकृति की ओर said...

    डॉ. डंडा लखनवी जी के दो दोहे

    माननीय डॉ. डंडा लखनवी जी ने वृक्ष लगाने वाले प्रकृतिप्रेमियों को प्रोत्साहित करते हुए लिखा है-

    इन्हें कारखाना कहें, अथवा लघु उद्योग।
    प्राण-वायु के जनक ये, अद्भुत इनके योग॥

    वृक्ष रोप करके किया, खुद पर भी उपकार।
    पुण्य आगमन का खुला, एक अनूठा द्वार॥

    इस अमूल्य टिप्पणी के लिये हम उनके आभारी हैं।

    http://pathkesathi.blogspot.com/
    http://vriksharopan.blogspot.com/

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  9. परिवर्तन सत्य है लेकिन इस पर से मुखौटा उठाने वालो इमानदार हाथो को आगे आने की जरुरत है . इस कविता के माध्यम से आज के सामयिक परिवेश पर करारी चोट की है आपने .

    ashishkriti.blogspot.com .

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  10. बैठ गयी है धांधली जो आफिसों में ,
    जमाने का रफ्तार समझ नहीं आता !
    .........................
    एक तीखा सच लिखा है तुमने !

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  11. सत्यता को उदघाटित करती आपकी सार्थक रचना के लिए आपको बधाई!

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  12. नेह और अपनेपन के
    इंद्रधनुषी रंगों से सजी होली
    उमंग और उल्लास का गुलाल
    हमारे जीवनों मे उंडेल दे.

    आप को सपरिवार होली की ढेरों शुभकामनाएं.
    सादर
    डोरोथी.

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