मंगलवार, 22 नवंबर 2011

रुई के व्यापारी

धरती से दूर आसमान में
सफेद बादलों के बीच रहते हैं
रुइयों के थोक व्यापारी !

यहाँ देखो न, रुई ही रुई ,
कौन कातेगा इनके सूत
और बना देगा गुड्डे गुडिया
छोटे मझोले बड़े बड़े जीव !
पर वे रचते हैं रुइयों से
खिलौने, और भर देते हैं ,
छोटे छोटे सांसों के तार !
सांसों में तड़प थोडा सा प्यार !

खेल के लोभ उतर जाते हैं
ये संसार के समुन्दर में ,
भोले भाले जुट जाते हैं
तरह तरह के खेल में,
गीली हो जाती है देह की रुई
फिर डरते हैं , घबराते हैं ,
और यहीं मात खा जाते हैं !

बहुत दूर है उनका आसमान
समझते हैं ,जानते हैं कि
अब वे कभी नही उड़ पाएंगे
रुई होने की कोशिश में
उनके सारे इंधन चुक जायेंगे
रुई को देखते ही उन्हें
आसमान याद आता है ,
वह बेतरह छटपटाता है

कैसी है ये कारीगरी ,
जाने कहाँ छुप गये ,
वे खिलौनों के कारीगर
वे थोक रुइयों के व्यापारी !

शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

संकल्प

जरुरत के पास
समय और सीमा होती है ,
पर लड़ाई के पास नहीं !!!

जब जिन्दगी की राह
हक और लड़ाई
से होकर गुजरती है
तो वह सिर्फ बहाव नही ,
धारा होती है... वेगवती
हिमस्फुलिंग उछालती !!!

और धारा कभी रूकती नहीं
बहा ले जाती बाधाओं को
तोड़ देती है चट्टानों को ,
उसे चाहिए अपना
संकल्प ! सत्य संकल्प !!

ये धारा अमर है ,
आइना दिखाती रहेगी ,
युगों युगों तक
कालिख में डूबी
कलुषित आत्माओं को !!!

कुछ सत्य संकल्पों के साथ आप सबको दीपावली की हार्दिक शुभ कामनाएं !

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

यहीं कहीं.....

कभी आते हो तुम
यों ही हडबडी में ,
अतिरिक्त दुःख से उदासीन
कुछ ढूंढते कुछ पूछते ;
गहरी ख़ामोशी ओढ़े !
बहुत दिन बीत जाते हैं
बिना किसी सुख के
दरक ही जाते हैं ...
दुःख भी !
कहीं कुछ भी तो नहीं
छीज जाते हैं झगड़े भी !
तुम नहीं जानते
मैं नहीं मानती
क्योंकि दीखता नहीं
पर प्यार है
यहीं कहीं ..................!

शनिवार, 18 जून 2011

एक उतरती साँझ में

एक उतरती साँझ में ,
उदास गंगा के किनारे ,
प्रति बिम्बित परछाइयों में ,
ढुलक गया वह बड़ा मोती !

बीत रही अठखेलियाँ
खो गई अब रौशनी
बुझ रहे थे रंग पल पल
बांधता इक नांव आखिरी !


मोती नही वह चाँद था
जिसमे सजा था घर हमारा
छलकता था स्नेह जल से
जाने कब रेत हो गया !


उड़ गये पांखी उडान भरते ,
सो गये वे, दे दंश शूलों के
छोड़ते हैं किनारे भी अब साथ
इस उतरती साँझ में !

सोमवार, 21 मार्च 2011

चांदनी

हिय में उतरी चांदनी जो
मन को जलाती भी रही ,
और जुडाती भी रही !!
पीड़ा है मेरी वह,
समझाती भी रही
और डराती भी रही !!
चन्दन बन घुल गयी जो ,
सर्प की तरह लिपटी भी रही ,
गंध सी मुक्तवाही भी रही !
पीड़ा है मेरी वह ,
उलझाती भी रही ,
सुलझाती भी रही !!
बदली सी छा गयी जो ,
आँखों में उमड़ती भी रही
और बरसती भी रही !!
पीड़ा है मेरी वह
डुबोती भी रही ,
तैराती भी रही !
यादों नें घेर लिया जो ,
चलचित्रों में हँसातीभी रही
और रुलाती भी रही !!
पीड़ा है मेरी वह ,
रागी भी रही ,
बैरागी भी रही !!

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

हिसाब करो




आये हैं लडके शहर में देने परीक्षा !
उन्हें भविष्य नजर नहीं आता ! !
हर कदम है नियम कानून उन्हें,
सडक पर चलना नहीं आता ! !
बेकारी के बोझ, बेरुखी से परेशान!
उन्हें अलग से दिखना नहीं आता !!
बैठ गयी है धांधली जो आफिसों में ,
जमाने का रफ्तार समझ नहीं आता ! !
रफ्तार जो दरकिनार करती है उन्हें !
बैठ गये रेल पर और अब कुछ नहीं सुहाता !!
उठो देश के जवानो, लुटेरों को बेनकाब करो !
हक जिसने लूटा है उससे अपना हिसाब करो !!

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

यादें

कच्ची तोड़ सुखाई यादें
शाम के रंग रंगी उदास यादें ,
राह चलते पुल पेड़ मकान नदी ,
के संग छूटती ओझल होती यादें !

गिलहरी की पूंछ सी फिसलती यादें !

उड़ते पंखों वाली खुशियों की यादें !

बेमुरौवत दिल को दुखाती यादें !

इन सबको बहुत भुलाया ,
पर भूली नही दिल पर ,
सिल की तरह जमीं,
बैठी यादें !