नदी तुम परंपरा हो
गीतों की कड़ियों में,
सोलह संस्कारो में ,
देव सिद्ध जैन बौद्ध और,
आक्रान्ताओं की भी साक्षी !

आह्लादित करती बहती रहती हो !
बदले में तुम्हे मिटाने को आतुर हम
हे परम्परा मयी
क्षमा करो !
नदी तुम गरिमामयी हो
समा लेती अपने में
समूची माटी मानव की !
पूर्ण अपूर्ण मनोरथ के
बचे हुए कचरे को !
जलतरंगिणी बजती रहती हो
बदले में तुम्हे सुखाने को आतुर
हे गरिमामयी
क्षमा करो !
नदी तुम वामा हो
सोलह कलाओं से
रिझाती चाँद को
युगों तक बसाये रखती
हृदय के निर्भ्रान्त कोने में
हिलोरे लेती सजती रहती हो
बदले में व्यभिचार को आतुर हम
हे समर्पिता
क्षमा करो !
गीतों की कड़ियों में,
सोलह संस्कारो में ,
देव सिद्ध जैन बौद्ध और,
आक्रान्ताओं की भी साक्षी !
आह्लादित करती बहती रहती हो !
बदले में तुम्हे मिटाने को आतुर हम
हे परम्परा मयी
क्षमा करो !
नदी तुम गरिमामयी हो
समा लेती अपने में
समूची माटी मानव की !
पूर्ण अपूर्ण मनोरथ के
बचे हुए कचरे को !
जलतरंगिणी बजती रहती हो
बदले में तुम्हे सुखाने को आतुर
हे गरिमामयी
क्षमा करो !
नदी तुम वामा हो
सोलह कलाओं से
रिझाती चाँद को
युगों तक बसाये रखती
हृदय के निर्भ्रान्त कोने में
हिलोरे लेती सजती रहती हो
बदले में व्यभिचार को आतुर हम
हे समर्पिता
क्षमा करो !

