मंगलवार, 23 नवंबर 2010

द्वीप


द्वीप

साफ सुथरी सडक की तरह ,
नहीं जिन्दगी !
मेरे हाथ की रेखाओं
शांत रहना !

रेखाओं की तरह कुछ
कुछ द्वीप हैं मेरे ,
जो जैसे भी हों
हृदय के करीब हैं !

बहुत भूलती हूँ ,
यूँ ही कभी प्रेम में
सृजन में और
प्रतिफलित वर्तमान में !

लोग कहते हैं ,
भूलना अपने आपको
धोखा देना है ,
पर जबरन भूलती हूँ मै !

द्वीप के चारो ओर
सटे रहते हैं,
तरह तरह के डर
खतरे और अफवाहें !

अपनी अंतरंगता और
एकाकीपन में जानती हूँ ,
ये हरे भरे द्वीप
बचा लेते हैं जिन्दगी को !

ऐसा नहीं कि दुआएं न थी ,
अपने न थे ,
ऐसा भी नहीं कि
ये आगे न होंगें !

बावजूद इसके ,
ये द्वीप ही मेरे हैं ,
जिन पर संकटाग्रस्त
वक्त बेवक्त पहुंचती रही हूँ !
और अपने आप से मिलती रही हूँ मै !

25 टिप्‍पणियां:

  1. बावजूद इसके ,
    ये द्वीप ही मेरे हैं ,
    जिन पर संकटाग्रस्त
    वक्त बेवक्त पहुंचती रही हूँ !
    और अपने आप से मिलती रही हूँ मै !
    द्वीप को लेकर इतनी खूबसूरत पंक्तियाँ.... बेहद प्रभावी

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  2. अपनी अंतरंगता और
    एकाकीपन में जानती हूँ ,
    ये हरे भरे द्वीप
    बचा लेते हैं जिन्दगी को !
    ...........
    बचा लेने की कोशिश ही तो जीवन है ....और बच पाना भी तो जीवन का पर्याय है न !

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  3. बहुत ही सुन्दर रचना. शुभकामनाएं

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  4. बहुत सुन्दर रचना ... शायद हर किसी के मन में ऐसा ही एक द्वीप है जहाँ थकी भावनाएं क्चुह देर के लिए आती होंगी ...

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  5. अपनी अंतरंगता और
    एकाकीपन में जानती हूँ ,
    ये हरे भरे द्वीप
    बचा लेते हैं जिन्दगी को !
    यही तो जीवन कि सच्चाई है .. शुक्रिया
    चलते -चलते पर आपका स्वागत है

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  6. सच, कोई तो जगह होनी ही चाहिए जहाँ एकांत में कुछ पल गुजारे जा सकें

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  7. लोग कहते हैं ,
    भूलना अपने आपको
    धोखा देना है ,
    पर जबरन भूलती हूँ मै
    औरतें अपनी सुरक्षा के लिए द्वीप गढ़ती हैं .. वक़्त बे वक़्त वहाँ पहुँचने के लिए ..अपनी पहचान बनाये रखने के लिए अपने अस्तित्व को संकटों से मुक्त करने के लिए कितने रास्ते हैं उनके पास .. तुम्हारी यह कविता पढ़कर राहत मिली .. बधाईयाँ

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  8. बहुत बढ़िया ...
    लाजवाब ...

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  9. ये द्वीप ही मेरे हैं ,
    जिन पर संकटाग्रस्त
    वक्त बेवक्त पहुंचती रही हूँ !
    और अपने आप से मिलती रही हूँ मै !

    अपने आप से मिलाते यह दीप बहुमूल्य हैं उषा जी. बधाई.

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  10. ..खुशकिस्मत हैं वो जिन्हें सहारा है अपने द्वीपों का। तकलीफ तो तब होती है जब दरकने लगती है नींव।
    ..सकून देती, सुंदर दर्शन समझाती सशक्त कविता के लिए बधाई।

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  11. मन बहुधा द्वीप सा अनुभव करता है जीवन में।

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  12. लोग कहते हैं ,
    भूलना अपने आपको
    धोखा देना है ,
    पर जबरन भूलती हूँ मै !

    अन्दर कहीं चल रही कशमकश को
    बहुत खूबी से शब्दों में उतारा है आपने

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  13. लोग कहते हैं ,
    भूलना अपने आपको
    धोखा देना है ,
    पर जबरन भूलती हूँ मै
    .....
    धोखा यूँ जबरन
    आसान तो नहीं होता
    बनाना पड़ता है

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  14. द्वीप के चारो ओर, सटे रहते हैं,तरह तरह के डर,खतरे और अफवाहें !.....बहुत सुन्दर भावपूर्ण कविता है।

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  15. आदरणीय उषा राय जी
    नमस्कार !
    सुंदर दर्शन समझाती सशक्त कविता के लिए बधाई।
    बहुत-बहुत धन्यवाद...ब्लॉग को पढने और सराह कर उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया.
    संजय भास्कर

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  16. usha di
    bahut hi gahanta samete hue antarman ki sthiti ko bakhoobi abhivyakt karti hui bahut hi behtreen lagi aapki kavita.
    ये द्वीप ही मेरे हैं ,
    जिन पर संकटाग्रस्त
    वक्त बेवक्त पहुंचती रही हूँ !
    और अपने आप से मिलती रही हूँ मै !
    poonam

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  17. बहुत ही सुन्दर रचना लिखी है आपने. शुभकामनाएं

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  18. उषा राय जी,
    आपकी कविता में बहुत ही गहरी अभिव्यक्ति छुपी हुई है !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  19. और हाँ...आपके गुरुवर की रचना से उनकी गुरुता का पता चल रहा है...उन्हें मेरा अभिवादन कहें...और बधाई भी!

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  20. एक जगह स्थिर रहते हैं द्वीप ..लेकिन कभी कभी डूब भी जाते हैं ।

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  21. आप सबने इस कविता को पसंद किया बहुत बहुत धन्यवाद ! सभी अभ्यागतों का बहुत बहुत स्वागत है ! जितेन्द्र जी आपका संदेश गुरुवर तक पंहुचा दूंगी ! शरद जी मै हाथ की रेखाओं और द्वीप की बात कर रही हूँ ,और द्वीप वक्त पर काम आते हैं , कभी आप भी आजमा लीजियेगा ! इस आत्मीयता के लिए धन्यवाद ! उम्मीद है आगे भी आप सबका सहयोग बना रहेगा !

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