मंगलवार, 23 नवंबर 2010

द्वीप


द्वीप

साफ सुथरी सडक की तरह ,
नहीं जिन्दगी !
मेरे हाथ की रेखाओं
शांत रहना !

रेखाओं की तरह कुछ
कुछ द्वीप हैं मेरे ,
जो जैसे भी हों
हृदय के करीब हैं !

बहुत भूलती हूँ ,
यूँ ही कभी प्रेम में
सृजन में और
प्रतिफलित वर्तमान में !

लोग कहते हैं ,
भूलना अपने आपको
धोखा देना है ,
पर जबरन भूलती हूँ मै !

द्वीप के चारो ओर
सटे रहते हैं,
तरह तरह के डर
खतरे और अफवाहें !

अपनी अंतरंगता और
एकाकीपन में जानती हूँ ,
ये हरे भरे द्वीप
बचा लेते हैं जिन्दगी को !

ऐसा नहीं कि दुआएं न थी ,
अपने न थे ,
ऐसा भी नहीं कि
ये आगे न होंगें !

बावजूद इसके ,
ये द्वीप ही मेरे हैं ,
जिन पर संकटाग्रस्त
वक्त बेवक्त पहुंचती रही हूँ !
और अपने आप से मिलती रही हूँ मै !

शनिवार, 13 नवंबर 2010

मेरे गुरु डा ०अब्दुल बिस्मिल्लाह को आज कथाक्रम सम्मान से सम्मानित किया गया है !मुझे उनका साहित्य बहुत पसंद है ! उनकी एक कविता प्रस्तुत करती हूँ !

वे और उनके बच्चे

कपास के सारे पौधे हमने
टोपियों के लिए चुन लिए
और वे
लंगोटियों का ख्वाब देखते रहे !

वे इंतजार करते रहे
कि बालियों का दूध जमें
और हमने उन्हें
मदिरालय के लिए
तोड़ लिया !

हम हवा में भरते रहे खुशबु
और वे कर्ज मांगते रहे साँस

वे सोचते रहे
कि हम जरा मुस्कराएँ
और हम
उनकी मूढ़ता पर खिलखिलाते रहे !

हम अपने बच्चों को
पटाखे दिलवाते रहे
और उनके बच्चे
बंदूक चलाना सीख गये !