सिली माचिसे
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सिली माचिसों की तरह ,
गलियों और सडकों पर घूमते हैं बच्चे
सदियों की सीलन सवार है ,
उनकी कच्ची उम्र के सीने पर !
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घरों के पीछे टूटी छतों के नीचे ,
हमारी लापरवाही और बेरुखी ,
झुनझुने की तरह बजाती है उन्हें !
वह धूप जो तय थी उनके लिए ,
शायद किसी चांदनी के ,
साये में पलने लगी है अब !
ज्यादा नहीं बस ,
एक ही साँस चाहिए ,
तबियत भर गर्म सी !
भूख में रोटी सी ,
खेल में जीत सी ,
ठिठुरन में माँ की गोदी सी !
ठनठनाते सिक्के की तरह ,
बजने लगेंगी सिली माचिसें ,
और जल जायेंगे असंख्य दीप
इन गरीब तंगहाल उदास अंधेरों में !
वह धूप जो तय थी उनके लिए ,
प्रत्युत्तर देंहटाएंशायद किसी चांदनी के ,
साये में पलने लगी है अब !
क्या बिम्ब दिया है आपने ...
बहुत खूब
घरों के पीछे टूटी छतों के नीचे ,
प्रत्युत्तर देंहटाएंहमारी लापरवाही और बेरुखी ,
झुनझुने की तरह बजाती है उन्हें !
सिली माचिसें !बहुत सुन्दर रचना क़ी है तुमने .सिली माचिसों कि सीलन को महसूस करके उनको मोतियों में पिरोना बहुत खूब है ...चांदनी भी धूप के साए में पलने लगी है ..बहुत पीड़ा है इन पंक्तियों में .सदियों कि इस पीड़ा को तुमने महसूस किया यह कवि ह्रदय का परिचायक है .इतना सुन्दर प्रवाह है कि जितनी तारीफ क़ी जाए कम होगी
उषा जी बहुत मार्मिक कविता है। मेरा सुझाव है कि सिली की जगह सीली होना चाहिए। वह सीलन से ही बना है। कविता के साथ चित्र अच्छा है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंराजेश जी ! वास्तव में सिली की जगह सीली होना चाहिए था ! मार्ग दर्शन और हौसला बढ़ाने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद !
प्रत्युत्तर देंहटाएंउफ्फ्फ !!!!!! कितना सच कितना कड़वा और किसको मिला. नाजुक फूल से बच्चों को और आपका विश्लेषण उस दुःख और बढ़ा गया कविता बहुत कुछ कह गयी
प्रत्युत्तर देंहटाएं''ज्यादा नहीं बस ,
प्रत्युत्तर देंहटाएंएक ही साँस चाहिए ,
तबियत भर गर्म सी !''
..............
बहुत सुंदर पंक्ति !!!
usha ji
प्रत्युत्तर देंहटाएंsukh batne se bdta hai dukh batne se ghtta hai . aapne unki tkleef ko mhsoos kiya bhi our kraya bhi . aise njriye se smaj me smvedansheelta bni rhti hai jo aaj ki bhut bdi jroorat hai .
bhut umda post . thanks .
ज्यादा नहीं बस ,
प्रत्युत्तर देंहटाएंएक ही साँस चाहिए ,
तबियत भर गर्म सी !
भूख में रोटी सी ,
खेल में जीत सी ,
ठिठुरन में माँ की गोदी सी ..
पीड़ा होती है समाज को देख कर ...
ये सब बहुत कुछ तो नही देने के लिए ...
Kya khub ukera hai ek kadwe pr Sacchi Mithi Baat ko ...............Shukriya
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपको भी दीपावली की अनेक शुभकामनायें ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत मार्मिक कविता है।
बहुत अर्थपूर्ण और मार्मिक रचना..... थोड़ी देरी से पढ़ पा रही हूँ.....
प्रत्युत्तर देंहटाएंदिवाली हार्दिक शुभकामनाये....
वह धूप जो तय थी उनके लिए ,
प्रत्युत्तर देंहटाएंशायद किसी चांदनी के ,
साये में पलने लगी है अब !
ज्यादा नहीं बस ,
एक ही साँस चाहिए ,
तबियत भर गर्म सी !
रचना कथ्य और शिल्प दोनों ही दृष्टि से प्रभावी है.बहुत खूब.यूँ ही लिखते रहिये. शुभकामनायें.
बहुत सुंदर अर्थपूर्ण रचना. दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें !
प्रत्युत्तर देंहटाएंusha di,
प्रत्युत्तर देंहटाएंdeep-parv aur bhai -duuj ki bdhai kisi karan vash der se de rahi hun.shubh kamna swikar karen.
bahut hi marmik avam dil ko chhoo lene wali bahut hi prabhavit karti hui sampurn kavita.
ज्यादा नहीं बस ,
एक ही साँस चाहिए ,
तबियत भर गर्म सी !
भूख में रोटी सी ,
खेल में जीत सी ,
ठिठुरन में माँ की गोदी सी ..
bahut hi sundar abhivyakti.
aabhar-----------------------poonam
आम आदमी के हित में मह्त्वपूर्ण योगदान।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसराहनीय लेखन....हेतु बधाइयाँ...ऽ. ऽ. ऽ
सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी
सड़कों पर बिखरी हुई
प्रत्युत्तर देंहटाएंबच्चों की मासूमियत को
बहुत खूबी से शब्दों में प्रस्तुत किया है आपने
काव्य-प्रवाह प्रभाव छोड़ता है
अभिवादन .
उषा जी,
प्रत्युत्तर देंहटाएंनमस्ते!
चोट करती है.
आशीष
अच्छी और सार्थक कविता के लिए बधाई स्वीकार करें।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसीली माचिसें गाँव में नंग धडग घूमते बच्चों पर लिखी गई है !जिनके लिए पढ़ाई आज भी सपनों की दुनियां है ! आप सबने व्यापक प्रतिक्रियाएं दी मै आप सबकी बहुत बहुत आभारी हूँ
प्रत्युत्तर देंहटाएं