बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

सिली माचिसे



सिली माचिसे

सिली माचिसों की तरह ,
गलियों और सडकों पर घूमते हैं बच्चे
सदियों की सीलन सवार है ,
उनकी कच्ची उम्र के सीने पर !
घरों के पीछे टूटी छतों के नीचे ,
हमारी लापरवाही और बेरुखी ,
झुनझुने की तरह बजाती है उन्हें !

वह धूप जो तय थी उनके लिए ,
शायद किसी चांदनी के ,
साये में पलने लगी है अब !

ज्यादा नहीं बस ,
एक ही साँस चाहिए ,
तबियत भर गर्म सी !
भूख में रोटी सी ,
खेल में जीत सी ,
ठिठुरन में माँ की गोदी सी !

ठनठनाते सिक्के की तरह ,
बजने लगेंगी सिली माचिसें ,
और जल जायेंगे असंख्य दीप
इन गरीब तंगहाल उदास अंधेरों में !