शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

स्वीकार लो मुझे

तुम कैसे मिलीं मुझसे
जैसे मिलती है ,
गोरी सुबह सांवली रात से !
आधी रात के बाद ,
गाये जाने वाले राग की तरह
मेरे भीतर अंगड़ाई लेती है ,
एक भरपूर उडान !
विरह की दर्दीली धुन की तरह ,
समा गयी हो तुम
मेरे पोर पोर में !
दिनों रात चलती है एकतानता !
कहीं कुछ और नहीं
तकदीर ने हमें मिलाया
और थमा दिए हैं पंख ,
अब न कोई है न कोई होगा ,
मेरे जितना ,मेरे जैसा
तुम्हें चाहने वाला !
स्वीकार लो मुझे !

17 टिप्‍पणियां:

  1. chaahanewaale se jyaada koun chaah sakta hai .sweekaar toh karanaa hi hoga .... bahut sundar hai har pankti .tumhen badhaayi ..

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  2. बड़ी खूबसूरती से रचनाकार ने अपने आप को समर्पण किया है ......!!

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  3. हमने तुमको प्यार किया है इतना !
    कौन करेगा उतना .........?
    हमने तुमसे मनुहार किया है इतना !
    कौन करेगा उतना ???

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  4. बहुत ही खूब लिखा आपने , सुंदर सरल रचना ,,,,शुभकामनाएं

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  5. Shusheela puri ji ki baat hi sabsey badhiya tareekey sey kah gayee apni baat.Bahut pyari rachna ke liye dhanyavaad.aapki kalam mey sab kuch hai makbooliyat ke liye.
    sader,
    dr.bhoopendra
    jeevansandarbh.blogspot.com

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  6. विरह की दर्दीली धुन की तरह ,
    समा गयी हो तुम
    मेरे पोर पोर में !
    दिनों रात चलती है एकतानता
    दर्द विरह और समर्पण सब कुछ एक साथ वाह !!!!

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  7. !!!!!!!!!!!!!!!!!
    !!!!!!!!!!!!!!!!!
    !!!!!!!!!!!!!!!!!
    !!!!!!!!!!!!!!!!!
    !!!!!!!!!!!!!!!!!
    Ashish
    --
    Bachelor Poha!!!

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  8. मनोभावों का दर्शाती सुंदर और सरल रचना....
    पढ़कर अच्छा लगा उषाजी.... आभार

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  9. "तुम कैसे मिलीं मुझसे
    जैसे मिलती है ,
    गोरी सुबह सांवली रात से !"
    के स्थान पर
    "तुम मिलीं
    जैसे मिलती है ,
    सुबह सांवली रात से !"

    क्या बेहतर प्रयोग नहीं होता ?
    एक अच्छी रचना जो कविता की उड़ान ले सकती थी रचना के स्तर पर ही डिब्बाबंद कर दी गई (भाव के स्तर पर भी )
    एक नया लिखने वाला यदि ऐसी गलती करे अनदेखा किया जा सकता है .. लेकिन जो कविता और उसकी बारीकी को आत्मसात कर चुका हो..कविता के शिखर का अवलोकन कर चुका हो (बज्ज़र और वैसी ही कई और रचनाएँ) उसे क्या कहा जाये क्या नहीं ?
    नहीं! उषा , केवल आपसे ही नहीं कह रहा आपके बहाने से खुद को भी डांट पिला रहा हूँ..पिछले दिनों स्वयं भी एक लंबी रचना "और मेरी नींद टूट गई" शीर्षक से न्वोत्पल पर लगाई थी इसी चूक के साथ ..कसा नहीं उसे ..जल्दबाजी कर दी ..मेरी बातों का बुरा नहीं मानना.. इन दिनों ब्लोगिंग में टिप्पणियों का चलन "उष्ट्रानाम विवाहेषु " के जैसा लगने लगा है

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  10. प्रिय उषा,
    मेरे भीतर एक बच्चा मन है और एक बूढा भी..आपही का लिखा कुछ विस्मित कर दे तो चहक उठता है और आपही का लिखा कुछ विचलित कर दे तमक उठता है ..सो इसे अन्यथा न लेना ..स्वभावदोष है मेरा दरगुजर करना..

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  11. आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद !
    लीजिये श्याम जी आपकी बात पूरी हुई और मैंने अपने स्वभाव की दूसरी कविता डाली ! जिसकी सार्थकता आप सबकी टिप्पणियों पर निर्भर है ! उम्मीद है आप सबका सहयोग बना रहेगा ! बहुत बहुत धन्यवाद !

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  12. Usha Masi ji
    बहुत पसन्द आया
    हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
    बहुत देर से पहुँच पाया ............माफी चाहता हूँ..

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  13. PAdhna Se man ko Santusti mili ...........accha laga......
    man ko kahi na kahi kachotne wali ek Marmik rachna lagi................

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  14. वाह ! आपकी एक कविता दूसरी कविता की ओर हाथ पकड़ खींचे लिए चली जाती है...

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