रविवार, 1 अगस्त 2010

उसका सपना

एक्वेरियम में ,
चटुल मछलियों की तरह
उसकी सोती आँखों में
तैरते हैं बेखौफ सपने !

चंद घंटे की रात ,
फेरती है गाढे रंग
और एक मीठी धुन
उसके बदरंग दिन पर !


बेहिसाब सालों से ,
बर्तन मांज मांजकर
घिस चुके हाथों में
लरज जाती है मेंहदी


दूर कहीं सरसराता है ,
लाल रेशमी दुपट्टा
मींठी आंच की लहक पर
पलता है एक सपना !


पलकों के उधड़ते ही
बढ़ जाता है दिन का दबाव
और सिकुड़ जाती हैं भवें
शादी का खर्चा जोड़ते जोड़ते !



18 टिप्‍पणियां:

  1. इतने dinon baad aayin पर kavita bahut संवेदना से भरपूर

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  2. बातों ही बातों में आपने उसकी बात कह दी जिसकी बात कोई बिनाबात नहीं करता।

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  3. मन को छूती हुई कविता है. सुंदर

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  4. बर्तन मांजनेवाले हाथों को भी तो मेहंदी की जरूरत होती ही है उनके भी तो सपने होते हैं भले ही खुली आँखों में न उतर पाएं तब भी उसका दुपट्टा भी तो उसी तरह सरसरायेगा ही ...मगर ज़िंदगी का यथार्थ उसके सपनों में दखलंदाजी करने से बाज़ नहीं आता है . तुमने बिना तारों वाले सितार में संगीत छेड़ा दिया .जिन्हें हम भूले रहते हैं उनको अपनी कविता में जीवित किया है .बहुत सुन्दर भावनाओं वाली कविता के लिए मेरी बधाई !

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  5. चंद घंटे की रात ,
    फेरती है गाढे रंग
    और एक मीठी धुन
    उसके बदरंग दिन पर !
    ............
    इन चार लाइनों मे आपने पूरी कथा कह डाली बहन ! विवशताओं का विराट जंगल एक कामगार स्त्री के सपनों को कहाँ खूबसूरत जगह दे सकता है ,उसे तो लगातार उसी जंगल मे भटकना है ,हाँ चंद घंटे की रात, जरूर उसके बदरंग दिनो को थोड़े से उधार के रंग या भूली हुई धुन से साक्षात करा देती हैं ।

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  6. शब्दों के फूलों से भावनाओं का ऐसा चित्रण ,
    जो तारीफ़ करने पे मजबूर दे ||
    बहुत अच्छी लगी, ये कविता ||

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  7. एक्वेरियम में ,
    चटुल मछलियों की तरह
    उसकी सोती आँखों में
    तैरते हैं बेखौफ सपने !
    अचूक!
    जोर लगाने पर समझ आ गयी!
    --------------------------------
    फिल्लौर फ़िल्म फेस्टिवल में आने का धन्यवाद!

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  8. बेहिसाब सालों से ,
    बर्तन मांज मांजकर
    घिस चुके हाथों में
    लरज जाती है मेंहदी

    और फिर यथार्थ का कठोर धरातल
    सुन्दर रचना

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  9. very nice!

    sabne bahut kuch kah diya, mera kahna bas duhraao hoga.

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  10. जिंदगी की जद्दोजहद में लगी इन लड़कियों के भी सपने तो होते ही हैं ...मुश्किल से पूरे होते हों तो भी ..!

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  11. chtul mchhliyon ki trh ....wah ! kya upma di hai .
    klpna our ytharth ka adbhut smnvy . smbhl kr pdhne wali kvita taki mrm tk phuch ja ske .
    bhut hi umda pryas .
    thhre pani me hui hlchl our kshti ka sfr aage bdha lmbe antral ke bad .

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  12. और सिकुड़ जाती हैं भवें
    शादी का खर्चा जोड़ते जोड़ते !

    .....बहुत खूब...रोचक लिखा..बधाई.

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  13. काव्य में सिर्फ शब्द नहीं हैं
    एक गाथा छिपी है
    उस जिंदगी की ,, जिसे गाया नहीं जाता अक्सर...
    आपकी भावनाएं क़ाबिल-ए-क़द्र हैं
    अभिवादन .

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  14. आपकी टिपण्णी के लिए आपका आभार ...अच्छी कविता हैं...बहुत अच्छी .

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  15. उषा आप तो न बस! पता नहीं कैसे चूक गई यह कविता मुझसे ?
    एक तो "चटुल" शब्द का अर्थ नहीं पता मुझे.. दुसरे "सोती" के स्थान पर "सोयी" में ध्वनि-संतुलन अधिक है .. आपकी रचनाधर्मिता के उतार-चढाव भी हमारे यहाँ के पहाड़ों जैसे हैं .. कहीं एकदम गिरि-उतंग कहीं पैरों में बिछी दर्द की रेखा ..
    इस कविता के लिए मेरी निशब्द स्तब्ध वाह!

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