शनिवार, 21 अगस्त 2010

सब सही कैसे हो सकता है


सब सही कैसे हो सकता है ,
भूमि के गर्भ में है ,
अंधकार गंदगी बदबू ,
सड़न और उबन,
जिसमें पलता हुआ बीज,
तेजी से अंकुआ के निकलता है ,
हरे भरे पौधे के रूप में !
वह बार बार स्मृतियों में डूब जाता है !
शायद वही रहता है उसके साथ ,
भय चिंता और घबराहट में ,
जड़ से उखड़ते उखड़ते
कहाँ आ पहुंचा है वह !
बूढी सदी थक गई है ,
पीठ पर उठाये ग्लोब !
लथपथ सी हांफती ,
जा रही है अनंत की ओर !
सब सही कैसे हो सकता है !

रविवार, 1 अगस्त 2010

उसका सपना

एक्वेरियम में ,
चटुल मछलियों की तरह
उसकी सोती आँखों में
तैरते हैं बेखौफ सपने !

चंद घंटे की रात ,
फेरती है गाढे रंग
और एक मीठी धुन
उसके बदरंग दिन पर !


बेहिसाब सालों से ,
बर्तन मांज मांजकर
घिस चुके हाथों में
लरज जाती है मेंहदी


दूर कहीं सरसराता है ,
लाल रेशमी दुपट्टा
मींठी आंच की लहक पर
पलता है एक सपना !


पलकों के उधड़ते ही
बढ़ जाता है दिन का दबाव
और सिकुड़ जाती हैं भवें
शादी का खर्चा जोड़ते जोड़ते !