बुधवार, 23 जून 2010

रुई


रुई

चलता है चरखा !
अहर्निश.........
कपास की रुई
का ताना बाना !

सूत का गोला ,
पचरंगी चोला ,

यादों में
टिमटिमाती है ,
उजली उजली ,
साँची साँची रुई !


चोले के मन को
रंग बिरंगे सपने ,
सुरों की उठान
सौंप जाती है रुई !


अवसाद सोखते
पुराने पड़ते ,
कपड़े के मन
को अक्सर
हल्का कर
जाती है रुई !

22 टिप्‍पणियां:

  1. wakai, ye rui ekdam tushar si thi, thandi..mohak..priy :)

    dhanyawaad

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  2. वाह उषा क्या रुई सी कोमल सौम्य धवल और गूढ़ रचना

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  3. Rui pe bhi koi likh sakta hai......:)

    superb!! adbhut wastav me.......!

    hamare blog pe aayen, naye post ko padhne:D

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  4. गागर में सागर भर लाई आपकी कविता।
    ---------
    क्या आप बता सकते हैं कि इंसान और साँप में कौन ज़्यादा ज़हरीला होता है?
    अगर हाँ, तो फिर चले आइए रहस्य और रोमाँच से भरी एक नवीन दुनिया में आपका स्वागत है।

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  5. यादों में
    टिमटिमाती है ,
    उजली उजली ,
    साँची साँची रुई
    यादों के किन किन गह्वरों में चली जाती हों तुम !समझ नहीं पाती मैं ...तुम रुई से अवसाद तक गयी ...चोले की बात की आत्मा तक गयी ..संसारिकता और आध्यात्मिकता ..दोनों को कितनी नरमी से गूंथ देती हों .. तुम्हारी उजली स्मृतियाँ विस्मित करतीं हैं ..दिल से बधाई !

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  6. बहुत सुन्दर और दिल को छुं जाने वाली रचना ...

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  7. रूई जैसी ऊष्‍मा से भरी आपकी कविता पढ़कर सूफी कविताएं याद आ गईं। शुभकामनाएं।

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  8. अवसाद सोखते
    पुराने पड़ते ,
    कपड़े के मन
    को अक्सर
    हल्का कर
    जाती है रुई !

    सही कहा आपने अवसाद झेलते मन को ये नाजुक स्पर्श कुछ तो रहत दे ही जाता होगा .....!!

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  9. अवसाद सोखते
    पुराने पड़ते ,
    कपड़े के मन
    को अक्सर
    हल्का कर
    जाती है रुई ...

    बहुत सुन्दर पंक्ति
    खुबसूरत भाव ||

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  10. आपके ब्लॉग का चित्र ही इतना आकर्षक है, की मत पूछो. और कविता ''रुई'', उतनी ही कोमल. रुई की तरह. कम लिख रही हैं, मगर अच्छा. बधाई.

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  11. खूब जोर लगाने के बाद इस निष्कर्ष पे पहुंचा हूँ के और जोर लगाना पड़ेगा....
    मेरे जैसे फूदुओं के लिए भी कुछ लिखें!!! प्लीज़!!!
    -----------------------
    इट्स टफ टू बी ए बैचलर!

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  12. मैने कितनी बार सोचा कि रूई पर कविता लिखूँ लेकिन आपने लिख ही डाली ... अच्छ्हा लगा

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  13. teis jun kebad se ye nav pani me thhr kyon gai hai ? kvita bhut hi umda hai . shbdo ka chunav our shilp dono ek dusre me guthe huye se lge .

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  14. यादों में
    टिमटिमाती है ,
    उजली उजली ,
    साँची साँची रुई !
    .......
    बेहद भावुक होकर जीवन की व्याख्या की है तुमने ....कबीर को छू रही हो ।

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  15. आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद !मुझे उम्मीद है की आगे भी आप सबका सहयोग तथा मार्ग दर्शन इसी प्रकार मिलता रहेगा !आप सबकी आभारी हूँ !

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