बुधवार, 23 जून 2010

रुई


रुई

चलता है चरखा !
अहर्निश.........
कपास की रुई
का ताना बाना !

सूत का गोला ,
पचरंगी चोला ,

यादों में
टिमटिमाती है ,
उजली उजली ,
साँची साँची रुई !


चोले के मन को
रंग बिरंगे सपने ,
सुरों की उठान
सौंप जाती है रुई !


अवसाद सोखते
पुराने पड़ते ,
कपड़े के मन
को अक्सर
हल्का कर
जाती है रुई !