शुक्रवार, 28 मई 2010

ताले


प्यार किया है मैंने,
उन लोंगो से ,जिनके जीवन में
बाहर निकलने के रास्ते में ,
कहीं कहीं पड़े है छोटे बड़े ताले !

पास रह के भी नहीं खुलते ,
अपनाने पड़ते हैं टेढ़े मेढ़े रास्ते !
पाप बताते , नरक रचते हैं
ये मन के बेवजह ताले !

सोने चांदी और लोहे ,
के ताले जिनमें बंद हैं ,
खुशियों की खिलखिलाहट
और रौशनी के झरने !

वह अनुभूति की दिव्यता ,
जिसे सर झुका के
हम मान लेते है
स्वीकारोक्ति से भर जाते हैं !

तालों के खुलने से ,
खुल जाती है नई दुनियां ,
सूरज के सामने जाते हैं
देखते हैं नई चीजें ,पुराने सरोकारों में !

अंकुरण से फल फूल तक ,
वसंत से पतझड़ तक
समझ में आता है जीवन ,
बहती हुई जीवन सरिता !

पल पल , हर पल
बदलता है जीवन जहाँ
हमने क्यों लगा रखें हैं ,
अनगिनत ताले वहाँ

24 टिप्‍पणियां:

  1. ye anginat tale.......jo har pal aapko roke rakhte hain.....!!!

    lekin koi nahi, jindagi hai to khwaishe bhi hain..........aur fir chabhiyan bhi mil jayengi..:)

    aage jane ke liye!!

    khubsurat rachna!
    kabhi hamare blog pe tashreef layen.....[:)]

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  2. बहुत सुन्दर रचना है ... दरअसल मुझे लगता है कि यह जो अनगिनत तालें जीवन के कितने ही दरवाज़ों पे लगे हैं, इनकी चाबी हमारे मन में ही है, और वो है हमारी इच्छा और दृढ निश्चय ...

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  3. jeevan ke raastoN meiN aane waali
    khwaahisheiN
    aur khwaahishoN ke raastoN meiN aane waale
    kaee taale
    achhee abhivyakti hai .

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  4. bahut hi umdaah rachna...
    taalon ki zindagi dikha di aapne to....

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  5. .aur haan mere blog par...
    तुम आओ तो चिराग रौशन हों.......
    regards
    http://i555.blogspot.com/

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  6. प्यार किया है मैंने,
    उन लोंगो से ,जिनके जीवन में
    बाहर निकलने के रास्ते में ,
    कहीं न कहीं पड़े है छोटे बड़े ताले !
    ........................
    वाह !!! जीवन की कितनी बड़ी सच्चाई को तुमने शब्द दिया है ! सचमुच हमने अपने जीवन मे अनगिनत ताले लगा रखे हैं और उन्ही मे कैद अंधेरों मे भटकते भटकते बिता देते है सोने जैसा जीवन ....,अति सुंदर रचना के लिए आभार ।

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  7. सच है .. अपने को हर बंधन हर ताले से मुक्त कर के देखो तो रोशनी नज़र आती है ... बहुत अच्छा लिखा ...

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  8. पल पल , हर पल
    बदलता है जीवन जहाँ ॥
    हमने क्यों लगा रखें हैं ,
    अनगिनत ताले वहाँ
    .जीवन के सत्य का एक पहलू. बेहतरीन अभिव्यक्ति

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  9. ''taale'' ke bahane bahut-si baaten ''khulati'' hai. ek bhavpoorn rachanaa k liye badhai. tale sub tootane hi chahiye, zindagi kaa arth tab khul jayega. badhai is rachanaa ke liye

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  10. पास रह के भी नहीं खुलते ,
    अपनाने पड़ते हैं टेढ़े मेढ़े रास्ते !
    पाप बताते , नरक रचते हैं
    ये मन के बेवजह ताले !
    बहुत बड़ी कही है तुमने तालों के माध्यम से ....ताले जीवन के हर मोड़ पर हमें ज़िन्दगी के आँगन में महकने से रोक देते हैं ...गंभीर विवेचना का विषय हैं ये ताले !!!

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  11. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  12. ..तालों के खुलने से ,
    खुल जाती है नई दुनियां
    ...वाह! जंग लगे ताले जल्दी खुलते भी तो नहीं..!

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  13. Chitr dekh kar acchha laga, darwaaza khula hai!
    Umda abhivyakti.....
    Muhabbat ki chabi se khul jaate hain sab taale.....

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  14. आपके ब्‍लाग पर आकर अच्‍छा लगा। यह कविता कुछ इस तरह मन में समायी कि मन के ताले खुल गए।

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  15. खूबसूरत विचार है लेकिन इन्हे कविता के शिल्प में ढालने के लिये कुछ शब्द इधर उधर करने होंगे ।

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  16. प्यार किया है मैंने,
    उन लोंगो से ,जिनके जीवन में
    बाहर निकलने के रास्ते में ,
    कहीं न कहीं पड़े है छोटे बड़े ताले !- दीदी आपने बहुत सुनदर कविता लिखी.....देवभूमि में आपका स्वागत है॥

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  17. "सोने चांदी और लोहे,
    के ताले जिनमें बंद हैं,
    खुशियों की खिलखिलाहट
    और रौशनी के झरने!"
    --------------------
    बड़ी प्रभावकारी रचना है। मर्म को छू गई.........
    सद्भावी - डॉ० डंडा लखनवी
    ////////////////////////

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  18. वह अनुभूति की दिव्यता ,
    जिसे सर झुका के.............सुंदर रचना ॥बधाई...

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  19. आप सबने इस कविता को पढ़ा और अपनी प्रतिक्रिया से नवाजा ! मै आप सबकी आभारी हूँ !मुझे पूरा विश्वास है की आगे भी आप सबका सहयोग इसी प्रकार मिलता रहेगा ! एक बार फिरआप सबका हार्दिक धन्यवाद !

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  20. ek koshish kijiye . bnd tale ki chabhi ko aasman me uchhal dijiye .gouraiya se pnkh udhar leke us chabhi ko dhudhne ke liye unmukt udan bhriye .jitni unchi udan hoti jayegi vaise vaise tali hkud-b-khud khulte chle jayenge .

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  21. बाहर निकलने के रास्ते में ,
    कहीं न कहीं पड़े है छोटे बड़े ताले !

    पास रह के भी नहीं खुलते ,
    अपनाने पड़ते हैं टेढ़े मेढ़े रास्ते !
    पाप बताते , नरक रचते हैं
    ये मन के बेवजह ताले !
    मेरी पसंद का ख्याल पिरोया है इस रचना में आपने ..बहुत सुन्दर उषा आप और प्रज्ञा पाण्डेय मुझे बहुत अच्छी लगती हैं आप दोनों मिल कर कुछ ऐसा कर सकती हैं भले ही बहुत छोटी शुरुआत लेकिन सार्थक मातृत्व के अधिकार और दायित्व को संदर्भ बनाकर इसके लिए आप दोनों से मुझे एक लंबी बात करनी होगी कहाँ और कैसे हो सकती है यह बात..पिछले दिनों मैं श्रीश जी के न्वोत्पल पर था..पता लिख रहा हूँ वहाँ आइये खुल कर बात कर पायेंगे
    navotpal.wackwall.com/

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