गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

नदी और हम



नदी तुम परंपरा हो
गीतों की कड़ियों में,
सोलह संस्कारो में ,
देव सिद्ध जैन बौद्ध और,
आक्रान्ताओं की भी साक्षी !


आह्लादित करती बहती रहती हो !
बदले में तुम्हे मिटाने को आतुर हम
हे परम्परा मयी
क्षमा करो !


नदी तुम गरिमामयी हो
समा लेती अपने में
समूची माटी मानव की !
पूर्ण अपूर्ण मनोरथ के
बचे हुए कचरे को !


जलतरंगिणी बजती रहती हो
बदले में तुम्हे सुखाने को आतुर
हे गरिमामयी
क्षमा करो !


नदी तुम वामा हो
सोलह कलाओं से
रिझाती चाँद को
युगों तक बसाये रखती
हृदय के निर्भ्रान्त कोने में



हिलोरे लेती सजती रहती हो
बदले में व्यभिचार को आतुर हम
हे समर्पिता
क्षमा करो !







26 टिप्‍पणियां:

  1. नदी
    ने बदली हर सदी
    पाषाणों मे भरकर शिवत्व ।
    आपकी रचना नदी के बहुआयामी स्वरूप को सजीव करती है ।

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  2. अहा ! ! ! ! ! 'सदानीरा'.....गंगा ....जमुना ....सरस्वती ....नर्बदा....सोन....सरयू .....कहाँ -कहाँ नही नहा आई मै !!!!! इतनी पवित्र व निर्मल रचना के लिए तुम्हें हार्दिक बधाई और तुम्हारी उस गहरी संवेदना के प्रति नतमस्तक हूँ जहाँ तुम उस निर्झर्णी से क्षमा की प्रतीक्षा मे हो... । कविता के अनुरूप चित्र चार चाँद लगा रहा है बधाई ।

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  3. तुम्हारी कविता में तुम्हारी वेदना मुखर है! नदियाँ तो सचमुच हमारे सुख दुःख की साक्षी हैं उन्हीं के किनारे तो आकर बसे हम अपने घर बनाये खेत सींचे पले जिए हम उनको किस तरह सोख रहें हैं आज !बहुत मार्मिक है कविता का यह कहना कि आज हम व्यभिचार कर रहें हैं उनके साथ !सच में गहराई से महसूस करें तो हम अपनी ही जननी की हत्या के दोषी हैं .. लेकिन हम खुद ही तो न्यायाधीश हों चुके हैं . तुम्हारी कविता अपनी भाषा में यह सब कुछ स्पष्ट व्यक्त कर रही है . इतनी मर्मपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए तुम्हें बधाई

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  4. Nadi tum jindagi ho, tumhare karan ham hain, aur yahan tak ki marne ke baad bhi tum me hi prawahit hote hain.........:)
    prabhavkari rachna.........!!
    kabhi hamare jindgi ke keinvess ko dekhen
    www.jindagikeerahen.blogspot.com

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  5. bahut hi gambhirtaliye hue gaharai se lihi gai aapki post bahut hi marmsparshi abhivyakti.usha di, purnima di ne aapse v pragya di se baat karne ke liye kaha tha.par aswsthtavash aapdono logo se merri baat nahi ho pai.unhone aapdono ka e-mail addressbhi lene ke liye kaha tha.ab aage se bbbaate hoti rahengi.namskar.
    poonam

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  6. जलतरंगिणी बजती रहती हो
    बदले में तुम्हे सुखाने को आतुर
    हे गरिमामयी
    क्षमा करो !

    अद्भुत ......!!

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  7. बहती धारा है नदी ... आपने सुंदर जज्बातों को नदी की धारा की तरह प्रवाहित किया है इस रचना में ...

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  8. From:
    Rachana Dixit

    उषा जी,
    नदी तुम गरिमामयी हो
    समा लेती अपने में
    समूची माटी मानव की !
    पूर्ण अपूर्ण मनोरथ के
    बचे हुए कचरे को !
    बहुत बेहतरीन अभिव्यक्ति है.हम इन्सान तो कुदरत कि हर चीज़ को ऐसे ही लेते हैं जैसे ये सिर्फ हमारी ही हैं और अमिट हैं.इन पर दूसरे कितने लोग जीव जंतु निर्भर हैं कभी नहीं सोचते और अपने पैर पर खुद ही कुल्हाड़ी मारते हैं फिर दोष किसी और पर मढ़ देते हैं
    आभार

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  9. दरअसल है तो माँ ही...
    अचूक अभिव्यक्ति, भाव पूर्ण रचना!

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  10. कल कल बहती पावन धाराओं को अपवित्र/प्रदूषित करने की स्वीकारोक्ति के साथ निश्चल क्षमा याचना तथा अद्रश्य सन्देश कि हम पर्यावरण के प्रति सजग रहें - बहुआयामी लाजवाब रचना - ब्लॉग आर्काइव के नीचे झूलता वो "घोंसला" तो गजब.

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  11. नारी कि गरिमा और महत्ता को अभिव्यक्त करती एक गरिमा मय कविता..

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  12. maaf kijiyega...dusre tab me naari shirshk kavita padh rahi thi..aur tipani aapko preshit kar di...kripya delete kar dijiyega....

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  13. नदी तुम वामा हो
    सोलह कलाओं से
    रिझाती चाँद को
    बेहद खूबसूरत और प्रभावशाली भावमयी रचना

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  14. aagntuko ke karn khani na sun pai mafi chahti hun
    is smvednsheel rchna pr ykeenn grv kr skti hun bhut khoob .

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  15. bahut hi behtareen....
    nadi ka bahut hi khoobsurat chitran........
    -----------------------------------
    mere blog mein is baar...
    जाने क्यूँ उदास है मन....
    jaroora aayein
    regards
    http://i555.blogspot.com/

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  16. sab log khhamosh shandar hai kavita 10/10
    congratulation usha jiiiiiiiiii

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  17. wah! didi aapne shabdon me jaan daal diya..
    behad sundar kavita..mujhe chhma kijiyega bahut let se aapke blog par aaya..prantu ab niyamit aata rahunga.

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  18. बेहद खूबसूरत और प्रभावशाली भावमयी रचना

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  19. मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है
    क्या गरीब अब अपनी बेटी की शादी कर पायेगा ....!
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com/2010/05/blog-post_6458.html

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  20. नदी मैं जानता हूँ/ बूँद बूँद पहाड सा दर्द/ जब रिसता है तुम लेती हो जन्म..

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  21. सुन्दर रचना .. पर यह कितना अजीब है, दुष्टता के सारे कार्य गणित करे और क्षमा कविता को मांगनी पड़े !!!

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