शनिवार, 17 अप्रैल 2010

~धमक ~

सपनों और हकीकत के ,
रहस्यमय प्रकाश में
बढती जा रही उनकी धमक !

आती हैं आवाजें
लार सने दांतों की ,
घात की ताक में,
पोज बदलते पंजों की !
लहकती हैं भेस बदलती ,
नीली लपटें उनकी ओर !

पोर पोर सिहर जाता
नर्म नाजुक सा दिल
डर से भर जाता !

किसी भी वक्त
उतर जायेगा अँधेरा ,
रक्त मांस के आखिरी छोर तक !

सब नजर अंदाज करती ,
बढती जा रही उनकी धमक !

26 टिप्‍पणियां:

  1. आती हैं आवाजें
    लार सने दांतों की ,
    घात की ताक में,
    पोज बदलते पंजों की !
    लहकती हैं भेस बदलती ,
    नीली लपटें उनकी ओर !
    bahut umda..
    itni achhi rachna dene ke liye dhanyawaad aur badhai....
    regards
    shekhar

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  2. अरे वाह उषा जी बहुत तेज और पैनी धार है कलम की.क्या खूब लिखा है!!!!!!!!!!!!!!! पर सच यही है कि अक्सर "पोर पोर पुरवाई पहुंचाती है पीर" और हम चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते
    आभार

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  3. पोर पोर पुरवाई पहुंचाती है पीर"!!!
    धन्यवाद रचना ! पीर सुख -दुःख दोनों पहुँचाती है !
    औरत से उसका पोर पोर का ही नाता है !कैसा सच है !

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  4. प्रतीक, विम्ब और संकेत के माध्यम से आप अपनी बात को पूरी मजबूती से कह रही हैं ......और यही कविता की सवेदनात्मक सफलता है । हार्दिक बधाई ....इसी तरह अपने सरोकारों से जुड़ी रहें और नित नया रचती रहें ।

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  5. किसी भी वक्त
    उतर जायेगा अँधेरा ,
    रक्त मांस के आखिरी छोर तक !
    बड़ी शिद्दत से तुमने महसूस किया है पशुता की वीभत्सता को और तुम्हारे कवि मन ने अपनी बात को करूणा के साथ बिम्बित किया है और कविता में माधुर्य बनाये रखा है यह प्रशंसनीय है . बधाई

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  6. वीभत्स और मार्मिकता का एक अनूठा संतुलन है यह् कविता. बधाई.

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  7. किसी भी वक्त
    उतर जायेगा अँधेरा ,
    रक्त मांस के आखिरी छोर तक !

    बहुत सुंदर पंक्तियाँ ...... बधाई स्वीकारें

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  8. apane samay kee kroor pravrittiyon ka bimbo ke sahaare sundar niroopan kiyaa gayaa hai iss kavitaa me. pichhalee kavitaaon se kafee aage nikal gayi hai yah kavita..badhai.

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  9. बहुत अच्छी रचना...आपकी कलम की धार को सलाम...
    नीरज

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  10. किसी भी वक्त
    उतर जायेगा अँधेरा ,
    रक्त मांस के आखिरी छोर तक ...

    ये अंधेरा उम्र है .. अपना डर है ... विवशता है या समाज का दंश है ... पर उसकी धमक नगाड़े की तरह सुनाई देती है ... बहुत ही मार्मिक और यथार्थ लिखा है ...

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  11. आती हैं आवाजें
    लार सने दांतों की ,
    घात की ताक में,
    पोज बदलते पंजों की !
    लहकती हैं भेस बदलती ,
    नीली लपटें उनकी ओर !

    मननशील कविता .....!!

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  12. बहुत सुन्दर कविता !!
    ______________
    'पाखी की दुनिया' में इस बार माउन्ट हैरियट की सैर करना न भूलें !!

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  13. "आती हैं आवाजें
    लार सने दांतों की,
    घात की ताक में,"
    आज के वक्त में हमारी सोच और आचरणों को आइना दिखाती उत्कृष्ट रचना - आभार

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  14. क्या करें क्षमा जी !ये आज की हकीकत है ! साहित्य जगत, खेल जगत सब जगह शोषण है ! शोध छात्राओं की बातें सुन लीजिये !बड़े बड़े लोग कटघरे में आ जायेंगे !

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  15. mere blog par nayi kavita ...intzaar ...
    jaroor aayein...
    intzaar rahega

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  16. जय श्री कृष्ण...अति सुन्दर...इंतजार ...बहुत खूब....बड़े खुबसूरत तरीके से भावों को पिरोया हैं...| हमारी और से बधाई स्वीकार करें..होशो-हवास अपने सलामत रहे 'जिगर',
    मंजिल से पूछ लूंगा कहाँ जा रहा हूँ मैं...

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  17. पूरी रचना ही सुन्दर है ... आगाज़ से अंजाम तक ... इसलिए कोई दो-चार पंक्ति अलग से उद्धृत नहीं कर रहा हूँ ...

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  18. लेकिन इस धमक का विरोध तो करना ही होगा ....।

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  19. -------------------------------------
    mere blog par is baar
    तुम कहाँ हो ? ? ?
    jaroor aayein...
    tippani ka intzaar rahega...
    http://i555.blogspot.com/

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  20. एक बहुत ही अच्छी और संभावनाशील रचना के लिए बधाई...

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  21. दुस्साहसिक विषय पर लिखी गयी बेलौस रचना जो अधिकांश के मानस का व्यथानक है ।

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  22. आप सबने इस कविता को पसंद किया ! अपनी बहुमूल्य सुंदर टिप्पणी दी ! मै आप सबकी आभारी हूँ ! उम्मीद है भविष्य में भी आप सबका
    सहयोग इसी प्रकार मिलता रहेगा ! बहुत बहुत धन्यवाद !!

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  23. रहस्यमयी रचना ! लेकिन यहीं कहीं इन टिप्पणियों में एक पंक्ति बहुत प्रिय लगी पोर पोर पुरवाई पहुँचाने वाली कासिद सी पीर

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