गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

जिजीविषा

उडती पतंग
हवाओं के बिगड़ते ही ,
डगमगा जाती है !
बदनीयती काट देती है ,
उसे जड़ से !
निराधार सी चल पड़ती है ,
अनजानी दिशा की ओर !
ठूंठों की संगत में
ठहर जाती है उसकी दुनिया !

रहा करती थी आसमान में जो
हथेलियों में सिमट जाती है
आँखे मूंद लेती है जिन्दगी से !

जब की दामन में ,
उसके बची रहती है
थोड़ी सी नोक ,
थोड़ी सी डोर ,
खुला आसमान
और उड़ानेच्छा !

34 टिप्‍पणियां:

  1. "जब की दामन में ,
    उसके बची रहती है
    थोड़ी सी नोक ,
    थोड़ी सी डोर ,
    खुला आसमान
    और उड़ानेच्छा !"

    bahut badhiya ji...

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  2. रहा करती थी आसमान में जो
    हथेलियों में सिमट जाती है
    आँखे मूंद लेती है जिन्दगी से !
    बढ़िया प्रस्तुति, उषा जी ।

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  3. थोड़ी सी नोक और थोड़ी सी डोर से ही आगे फिर से उड़ान भरेगी वह
    एक दिन ,ये जो जिजीविषा है न !वहीं से तो विस्तार है जीवन का ,और यदि कुछ हम बचाये रख पाते हैं तूफानों के बीच ,तो वहीं से पुनः शुरुआत हो सकती है . तुम्हारी कविता संभावनाओं के द्वार खोलती है ....बधाई .

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  4. उडती पतंग
    हवाओं के बिगड़ते ही ,
    डगमगा जाती है !
    बदनीयती काट देती है ,
    उसे जड़ से !
    ....जबरदस्त ...खूब कही जी.
    _________
    "शब्द-शिखर" पर सुप्रीम कोर्ट में भी महिलाओं के लिए आरक्षण

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  5. उषा जी कमाल की बात कह दी एक पतंग के माध्यम से
    जब की दामन में ,
    उसके बची रहती है
    थोड़ी सी नोक ,
    थोड़ी सी डोर ,
    खुला आसमान
    और उड़ानेच्छा !

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  6. वाह उषा जी ! बहुत सुन्दर रचना !लेकिन विचार की आलोचना भी करूँगा ..
    उडती पतंग
    हवाओं के बिगड़ते ही ,
    डगमगा जाती है !
    (हवाओं पर यह निर्भरता ही क्यों?)

    बदनीयती काट देती है ,
    उसे जड़ से !
    (गिरने या कटने के डर क्या उड़ना ही छोड़ दे ?)

    निराधार सी चल पड़ती है ,
    अनजानी दिशा की ओर !
    (जिन दिशाओं की जानकारी थी, उन्होंने ही भला क्या दे दिया.. सिवा परतंत्रता के?)

    ठूंठों की संगत में
    ठहर जाती है उसकी दुनिया !
    (चलो ठहराव तो मिला ठूंठो के संग ही सही.. जिन्हें ठूंठ भी नसीब नहीं! उनका क्या?)
    रहा करती थी आसमान में जो
    (हर ऊंचाई का एक अवसान भी होता है)

    हथेलियों में सिमट जाती है
    आँखे मूंद लेती है जिन्दगी से !
    (जीवन से निराश होना किसी समस्या का समाधान नहीं है.. शाश्वत सौंदर्य की रचना प्रक्रिया में इस युद्धाह्त आकांक्षा का किसी ठूंठ में अंकुरित होना भी तो लक्ष्य हो सकता है)

    जब की दामन में ,
    उसके बची रहती है
    थोड़ी सी नोक ,
    थोड़ी सी डोर ,
    खुला आसमान
    और उड़ानेच्छा !(बहुत है बहुत है! और मैंने देखी है वह जीवट भी जो इतने भर से भी हवाओं के रुख मोड देती हैं)
    ..लेकिन जड़ को चेतन का प्रतीक क्यों बना दिया ?

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  7. उफ .. पता नहीं किस बहक में यह सब लिख गया ..लेकिन सचमुच ही बहुत सुन्दर रचना! कसी हुई!दिल को छू लेती है .. मेरा विरोध मह्त्वकान्क्षाओं और बंधनों को लेकर है ..क्यों मर्द को जिद्दी बच्चा और स्त्री को पतंग होना चाहिए ?जिसने भी हवाओं में उड़ना है अपने दम पर उडे.. एक दुसरे पर निर्भर होकर उड़ने का क्या अर्थ?

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  8. श्याम जी के विचारों से मै भी सहमत हूँ उषा !

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  9. श्याम जी !!! टिप्पणी में आपने स्त्री विमर्श पर अपने विचार स्पष्ट कर दिए है ! मै किन शब्दों में आपका धन्यवाद करूँ ! जिन बातो को हम महसूस करते है पर कह नही पाते ,आपने सहज ही कह दिया ! आपने जरूरी सवाल उठाये है ,मै जवाब देना चाहूंगी ! (१) हवाओं परनिर्भरता ....समाज और परम्परा छोडकर कहाँ जाएँ ! (२) मै यही कहलाना चाहती थी ! (३) इसी बौद्धिकता की दरकार है ! (४) ठूंठ में राठोड जैसे लोग भी तो होते है ! (५)जीवन का विकास जीवन का खिलना उचाईयों में ही तो पता चलती है !(६) धोखा खाए जीवन में फिर विश्वास जम नही पाता !(७ ) बहुत है " बहुत है "! कहकर आपने हौसला बढ़ाया ! मै आह्लाद से भर गई ! मै आप के प्रति आभारी हूँ !

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  10. श्याम जी बातों में विमर्श है लेकिन उषा के जवाब में बहुत अधिक सौन्दर्य है .....कविता विमर्श को ही निमंत्रित करती है ... जिस तरह पतंग के पास डोर है नोक है और उड़नेच्छा है उसी तरह कविता गतिमान संभावनाओं के द्वार खोलती है ..भविष्य क़ी सुंदर धूप लिए हुए !.बहुत सुंदर रचा तुमने ! तुम्हें दिल से बधाई !

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  11. पहली बार आपका ब्लॉग देखा. बहुत पसंद आया. जिजीविषा शीर्षक कविता भाव प्रवणता एवं अर्थ गाम्भीर्य की दृष्टि से उत्कृष्ट कोटि की रचना है.बधाई स्वीकार करें.
    लक्ष्मीकांत त्रिपाठी

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  12. achchii rachana ke liye badhai k saath ek sher de rahaa hoo-
    udane ko taiuyaar raho, aakash bulaataa hai.
    patjhar se naa ghabranaa madhumaas bulataa hai.

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  13. सबसे पहले तो आपको लेखिका परिषद की सहकोषाध्यक्ष का गरिमापूर्ण पद सम्भालने पर हार्दिक बधाई फिर जिजीविषा जैसी स्तरीय रचना को रचने के लिए धन्यवाद .नवीनतम रचना की प्रतीक्षा में .

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  14. निर्जीव की सम्वेदनशीलता को दर्शाने वाली यह सुन्दर कविता है ।

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  15. गिरीश जी !आपका स्वागत है! दंतेवाडा दुर्घटना से निश्चित ही आप आहत होंगे !हम सब दुखी हैं !

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  16. लक्ष्मी कान्त जी ! शरद कोकास जी आप का बहुत बहुत स्वागत है ! राज जी ! धन्यवाद हमे हर कदम पर आपका साथ चाहिए !

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  17. ...वहीं से तो विस्तार है जीवन का ,और यदि कुछ हम बचाये रख पाते हैं तूफानों के बीच ,तो वहीं से पुनः शुरुआत हो सकती है . तुम्हारी कविता संभावनाओं के द्वार खोलती है ...

    sushila ji ne mere man ki baat kah di.is kavita ke liye dher sari badhai.

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  18. सबसे पहले तो आपसे देरी से आने के लिए माफ़ी चाहता हूँ..... दरअसल मैं आजकल लखनऊ से बाहर हूँ..... और बाहर होने की वजह से नेट उपलब्ध नहीं था.... आज आपका ब्लॉग पूरा देखा...बहुत अच्छा लगा... अबसे हमेशा और पूरी उपस्थिति रहेगी....

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  19. धन्यवाद संध्या जी ! आपका बहुत बहुत स्वागत है !
    महफूज जी ! आपको देखकर बड़ी ख़ुशी हुई ! मै ही नहीं काफी लोग आपको याद कर रहे थे ! मेरा ब्लॉग पसंद आया !धन्यवाद शुक्रिया !

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  20. जब की दामन में ,
    उसके बची रहती है
    थोड़ी सी नोक ,
    थोड़ी सी डोर ,
    खुला आसमान
    और उड़ानेच्छा
    बहुत सुन्दर कविता. निराशा के बीच आशा का संचार करती हुई.

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  21. निराशा और आशा का द्वंद समझाती ... उद्देश्यपूर्ण कविता ...

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  22. उडती पतंग
    हवाओं के बिगड़ते ही ,
    डगमगा जाती है !
    बदनीयती काट देती है ,
    उसे जड़ से !
    निराधार सी चल पड़ती है ,
    अनजानी दिशा की ओर !
    ठूंठों की संगत में
    ठहर जाती है उसकी दुनिया !
    Aaah! Kya kah dala...

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  23. pahli baar aaya hoon aapke blog par .. ab aate rahunga ..aap bahut accha likhti hai , prastuth kavita bhi bahut sundar hai ... aur bahut se sanvedansheel vichaaro ko apne me samete hue hai .....badhayi sweekar kijiye ..

    aabhar

    vijay
    - pls read my new poem at my blog -www.poemsofvijay.blogspot.com

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  24. उसके बची रहती है
    थोड़ी सी नोक ,
    थोड़ी सी डोर ,
    खुला आसमान
    और उड़ानेच्छा !

    बहुत अच्छे भाव हैं ...!!
    अच्छा लिखती हैं आप .....
    जब की को जबकि कर लें ....

    ye word verification hta lein ....

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  25. सर्वप्रथम नमस्‍कार आदरणीय उषा जी। आपके ब्‍लॉग पर पहली बार आने का सुअवसर प्राप्‍त हुआ । धन्‍य हो गया।।
    बहुत सुन्‍दर भावों और शब्‍दों के तानाबाने से सरोबार एक बहुत सुन्‍दर रचना।।


    निराधार सी चल पड़ती है ,
    अनजानी दिशा की ओर !
    ठूंठों की संगत में
    ठहर जाती है उसकी दुनिया !

    बेहद सुन्‍दर भाव । बधाई और आभार ।

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  26. सराहनीय ॥ आपने अपनी रचना में
    अनुभवों का खजाना संजोया है। बधाई!

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  27. kavita achhi lagi to dobaara chala aaya...
    mere blog par is baar..
    नयी दुनिया
    jaroor aayein....

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  28. आप सबने इतना मान दिया ! कविता को सम्मान दिया ! नत मस्तक हूँ ! उम्मीद करती हूँ आगे भी इसी तरह सहयोग मिलता रहेगा ! बहुत बहुत धन्यवाद !!!

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  29. "जब की दामन में,
    उसके बची रहती है
    थोड़ी सी नोक ,
    थोड़ी सी डोर ,
    खुला आसमान
    और उड़ानेच्छा!"
    वास्तविक हक़दार को ही मान और सम्मान मिलना चाहिए - आपकी सोच और शब्द वास्तव में इसके हकदार हैं - देर से ही सही मेरी भी बधाई कबूलें.

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  30. प्रिय उषा जी, आपकी एक दो रचनाएँ अपने ब्लॉग पर लगाने के लिए अनुमति दें ..आभार होगा !
    टिप्पणी-धाम http://nagbal.blogspot.com/2010/10/blog-post_05.html

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