गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

नदी और हम



नदी तुम परंपरा हो
गीतों की कड़ियों में,
सोलह संस्कारो में ,
देव सिद्ध जैन बौद्ध और,
आक्रान्ताओं की भी साक्षी !


आह्लादित करती बहती रहती हो !
बदले में तुम्हे मिटाने को आतुर हम
हे परम्परा मयी
क्षमा करो !


नदी तुम गरिमामयी हो
समा लेती अपने में
समूची माटी मानव की !
पूर्ण अपूर्ण मनोरथ के
बचे हुए कचरे को !


जलतरंगिणी बजती रहती हो
बदले में तुम्हे सुखाने को आतुर
हे गरिमामयी
क्षमा करो !


नदी तुम वामा हो
सोलह कलाओं से
रिझाती चाँद को
युगों तक बसाये रखती
हृदय के निर्भ्रान्त कोने में



हिलोरे लेती सजती रहती हो
बदले में व्यभिचार को आतुर हम
हे समर्पिता
क्षमा करो !







शनिवार, 17 अप्रैल 2010

~धमक ~

सपनों और हकीकत के ,
रहस्यमय प्रकाश में
बढती जा रही उनकी धमक !

आती हैं आवाजें
लार सने दांतों की ,
घात की ताक में,
पोज बदलते पंजों की !
लहकती हैं भेस बदलती ,
नीली लपटें उनकी ओर !

पोर पोर सिहर जाता
नर्म नाजुक सा दिल
डर से भर जाता !

किसी भी वक्त
उतर जायेगा अँधेरा ,
रक्त मांस के आखिरी छोर तक !

सब नजर अंदाज करती ,
बढती जा रही उनकी धमक !

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

जिजीविषा

उडती पतंग
हवाओं के बिगड़ते ही ,
डगमगा जाती है !
बदनीयती काट देती है ,
उसे जड़ से !
निराधार सी चल पड़ती है ,
अनजानी दिशा की ओर !
ठूंठों की संगत में
ठहर जाती है उसकी दुनिया !

रहा करती थी आसमान में जो
हथेलियों में सिमट जाती है
आँखे मूंद लेती है जिन्दगी से !

जब की दामन में ,
उसके बची रहती है
थोड़ी सी नोक ,
थोड़ी सी डोर ,
खुला आसमान
और उड़ानेच्छा !