गुरुवार, 25 मार्च 2010

महिला सशक्तिकरण का ऐतिहासिक मोड़

मार्च २०१० का दिन निश्चित रूप से ऐतिहासिक दिन था ,जब राज्यसभा ने शाम ७बजकर पचीस मिनट पर हुएमतदान में १०८ वें सम्विधान संशोधन विधेयक के रूप में महिला आरक्षण विधेयक बिल को एक के मुकाबले १८९मतों से पारित कर दिया !!! निश्चित रूप से वे सभी लोग धन्यवाद के पात्र हैं , जिन्होंने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप सेइस विधेयक को पारित करने में मदद की !
महिलाओं को राजनितिक रूप से सशक्त बनानेके लिए इस विधेयक की यात्रा लगभग १४ साल पुरानी है ! इसे लागूकरने के लिए समय समय पर प्रयास किया गया ! - १२ सितम्बर १९९६ देवगौड़ा सरकार द्वारा - १४ दिसम्बर१९९८ वाजपेयी सरकार द्वारा - २३ दिसम्बर १९९९ वाजपेयी सरकार द्वारा प्रयास किया गया ! परन्तु पेश होने सेपहले ही उसकी विफलता का अनुमान लगाया जा चुका था ! यह सुखद संयोग हुआ कि यह बिल मार्च २०१० कोपास हुआ !
स्त्री पुरुष की असमानता को देखते हुए विश्व के १३४ देशों में हुए, एक अध्ययन के अनुसार भारत ११४ वें क्रम परआता है ! विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के राज्यसभा तथा लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व क्रमशः तथा : ही है !!! हिंदुस्तान अख़बार के अनुसार आजादी के बाद से संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सातप्रतिशत से भी कम रहा है !!!
अब आइये देखते हैं कुछ विचार --- १९३१ में भारत के नये सम्विधान की रचना के लिए लन्दन में
बिटिश हुकूमत द्वारा बुलाये गये दूसरे गोलमेज सम्मेलन में गाँधी जी ने कहा था कि ---"मै उस विधायिका काबहिष्कार कर दूंगा ,जिसमें महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त हो ! " वे अक्सर कहा करते थे कि -- जबअबला सबला बन जाएगी तो सभी वंचित लोग शक्तिशाली बन जायेंगे ! इसी प्रकार डा. राम मनोहर लोहिया आजादभारत में स्त्री पुरुष समानता को अपना सबसे बड़ा ध्येय मानते थे ! वे कहते थे कि -आजाद हिंदुस्तान में हरआदमी राजा होगा मर्द भी और औरतें भी ! औरते अपने हक़ से राजा होंगी ,राजा की पत्नी होने के नाते रानी नहीं ! महिला परिवार की धुरी है ! इसलिए महिला सशक्तिकरण का होना जरुरी है !आज के प्रगतिशील युग में अनेकआर्थिक कार्यों में महिलाओं का योगदान बढ़ रहा है ! मशहूर अर्थशास्त्री अमर्त्यसेन का कहना है कि --
" यदि औरतों को अधिक अधिकार मिले तो गरीबी से अधिक तेजी से लड़ा जा सकता है ! "
कितनी अजीब बात है कि महिलाएं समाज के लगभग आधे भाग का प्रतिनिधित्व करती हैं ,लेकिन
उनकी राजनितिक सहभागिता लगभग नगण्य रही है ! आज आजादी के पचास साल बाद भी उनके विकास किप्रक्रिया काफी धीमी है ! किसी भी देश का समग्र विकास तब तक नहीं हो सकता जब तक कि उसकी आधी जनसंख्या अर्थात महिलाएं विकास से अलग रहें ! पुरुष और महिला के बीच असमानता की खाई को पाटने कीआवश्यकता है !यह तथ्य हम सभी को स्वीकार करना होगा कि महिलाओं में उर्जा है ,शक्ति है , वे दूरदृष्टि रखती हैं !
अतः महिलाओं कि भागीदारी के बिना पूर्ण विकास असम्भव है ! जब तक हम महिलाओं की निर्णय क्षमता , कुशलता योगदान व् अधिकारों का सम्मान नहीं करेंगे ,तब तक उनको विकास प्रक्रिया से नहीं जोड़ा जा सकता है
मुझे उम्मीद है कि महिला
: सशक्तिकरण के इस ऐतिहासिक मोड़ पर आप सब साथ देंगे !

12 टिप्‍पणियां:

  1. एक सशक्त लेख के लिए आभार, महिला सशक्तीकरण में सब साथ साथ ही हैं

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  2. Usha didi aapke in panktiyon ka mai kayal hun

    " यदि औरतों को अधिक अधिकार मिले तो गरीबी से अधिक तेजी से लड़ा जा सकता है ! "
    कितनी अजीब बात है कि महिलाएं समाज के लगभग आधे भाग का प्रतिनिधित्व करती हैं ,लेकिन
    उनकी राजनितिक सहभागिता लगभग नगण्य रही है !

    किसी भी देश का समग्र विकास तब तक नहीं हो सकता जब तक कि उसकी आधी जनसंख्या अर्थात महिलाएं विकास से अलग रहें !

    जब तक हम महिलाओं की निर्णय क्षमता , कुशलता योगदान व् अधिकारों का सम्मान नहीं करेंगे ,तब तक उनको विकास प्रक्रिया से नहीं जोड़ा जा सकता है

    is muhim me mujhe bhi shamil mane..mai bhi pratham pankti me khada rahna chahta hun .

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  3. उषा, महिला विधेयक के बारे तुमने बहुत संयत ढंग से तथ्यों से परिचित कराया है. ..तब भी यह बड़ी बात है कि इतना जूझने के बाद हमें रोशनी कि किरण मिली है ..हम तुम्हारी इस बात से पूरी तरह सहमत हैं !.. आज भी जबकि महिलाएं आधे हिस्से कि प्रतिनिधि हैं राजनीति में उनकी भूमिका नगण्य है अवश्य ही स्त्री पुरुष के बीच कि खाई को पाटने कि बेहद आवश्यकता है .इस मोड़ पर सारी महिलायें अवश्य साथ रहेंगी तभी समाज का हित सधेगा .तुम्हें इतने तथ्यपूर्ण आलेख के लिए ह्रदय से बधाई !

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  4. " यदि औरतों को अधिक अधिकार मिले तो गरीबी से अधिक तेजी से लड़ा जा सकता है ! "

    मशहूर अर्थ -विद्वान अमर्त्यसेन का यह कथन कितना मानीखेज है !
    आज विश्वपटल पर हमारा देश 'सोने की चिड़िया' नही एक गरीब देश की सूची मे ही आता है और उसका बहुत कुछ दारोमदार यहाँ की तथाकथित समतावादी विचारधारा और यहाँ की ''खाने के और दिखाने के और'' मानसिकता वाले चंद फिरकापरस्त ताकतों को जाता है . महिला आरक्षण का संसद के उच्च सदन राज्यसभा मे पास हो जाना एक ऐतिहासिक पल था किन्तु अभी उसका लोकसभा मे पास होना बाकी है और तमाम प्रयासों के बावजूद उसे अभी ठंडे बस्ते के ही हवाले कर दिया गया है . राजनीति मे 33प्रतिशत जगह पाने के लिए समाज के सभी जागरूक पुरुष और महिलाओं का एकजुट होना बेहद जरूरी है ...मायावती या मुलायम का आरक्षण के भीतर आरक्षण माँगना सिरे से वोट की राजनीति से प्रेरित है ,उन्हे सिर्फ कुर्सी का खेल खेलना है चाहे वहाँ हाशिये का कोई भी मनुष्य क्यूँ न हो .हमे एक ऐसा समाज बनाना है जहाँ स्त्री और पुरुष समान सहभागिता और सौजन्य के साथ प्रेमपूर्वक रह सकें और इस सपने को सच करने के लिए अभी हमारे लिए आरक्षण बेहद जरूरी है चूंकि सदियों से जो पित्रसत्तात्मक समाज रहा है हमारे देश मे उसने हम औरतों को हाशिये पर ही रखा है .
    उषा ! तुमने बेहद मौजूं विषय पर अपनी कलम चलाई है...मेरी हार्दिक शुभकामनायें तुम्हारी लेखनी और आने वाले महिला आरक्षण के लिए .

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  5. उषा जी,
    बिल पास होने के बाद मैंने एक मर्द को रोते-पिपियाते सुना: "तुमने मेरा केक छीन लिया! जाओ मैं तुमसे बात नहीं करता! तुम कितनी गन्दी हो! मैंने कबसे सहेज कर रखा था!"
    भई, हम तो जानते हैं और खुले आम मानते भी हैं कि ज़िन्दगी में जो कुछ अच्छा सीखा अस्सी फीसद औरतों ने ही सिखाया!
    हाँ, सशक्तिकरण कितना होगा, इस पर मुझे संदेह है! फिर भी, समथिंग इज बेटर देन नथिंग!
    www.myexperimentswithloveandlife.blogspot.com

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  6. सारगर्भीत .. सशक्त लेख है ... इसका स्वागत होना चाहिए और अमल में भी आना चाहिए ...

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  7. " यदि औरतों को अधिक अधिकार मिले तो गरीबी से अधिक तेजी से लड़ा जा सकता है ! "

    सशक्त लेख है.

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  8. आप सबने इस लेख को पसंद किया !
    आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद !
    वास्तव में यदि पुरुषों का सहयोग मिले
    और महिलाएं एक जुट हों ,तो एक नये
    स्वस्थ और सशक्त समाज का निर्माण
    हो सकता है ! बहुत बहुत धन्यवाद !
    उम्मीद है आगे भी हमें आपका सहयोग
    इसी प्रकार मिलता रहेगा !!!

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  9. प्रिय उषा जी, बहुत दिनों के बाद आपके ब्लॉग पर आना हुआ.. ऊपर कुछ रचनाएँ देखीं और महिला सशक्तिकरण के संदर्भ में आपका लेख भी पढा ..बहुत बधाई .. आपकी कलम में एक प्रखरता, एक तेज, एक विलक्षण धार आ गई है..लेकिन परम्परा के सम्मान की बात समझ में नहीं आई .. ये परम्पराएं जिन्हें हम ढो रहे हैं पितृसत्तात्मक समाज की देन हैं.. उंच-नीच, महिला-पुरुष, छोटा-बड़ा का भेद और विभाजन इसी पितृसत्तात्मक समाज और सोच का दिया हुआ है..स्वतंत्रता और दासता दोनों एक साथ कैसे निभ सकते हैं ? क्या आपको नहीं लगता परिवार चाहे स्त्री-वर्चस्व वाला हो या पुरुष-वर्चस्व वाला हो अंततः बंधन और दासता और आंशिक सुरक्षा का मोहक रूप है? क्या सभी प्रकार के सुरक्षा-कवचों को भेद कर जीना संभव नहीं? क्योंकि सुरक्षित होने की चाह ही हमें दासता में धकेलती है.. और यह राजनीति! यही तो सारी समस्याओं की जनक है..इसमें आने वाला कोई भी सुधार और और बिगाड़ लेन वाला ही सिद्ध हुआ है .. मेरे मन की इन आशंकाओं का समाधान यदि कर सकें तो आभारी रहूँगा

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  10. हाँ ! आपका ब्लॉग बहुत सुन्दर बन गया है ..और कविताएं भी बहुत प्यारी लगी ..

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