बुधवार, 10 मार्च 2010

समीरा

मलयाचल से चली समीरा
शत शत पंखों वाली !

सुर्ख पलाश के फूलों में ,
मन्त्र विद्ध सी अरुझाई !
मद कलश कली कुंड में ,
छककर
गोते खाई !
ताड़ वन से पीया दूध ,
और
पाकड़ बरगद में पुष्टाई!
दानामरुआ बनतुलसी ,

आम्रबौरों में घूम घूम गंधाई !
अब तो भूल गई गंतव्य ,

वासन्ती
फागुन में बौराई !

चकित चित्त सी चैत में लौटी ,
चहुँ
दिसी फ़ैल रही पियराई !





13 टिप्‍पणियां:

  1. आहा !!! मलयानिल की अनुपम यात्रा का मोहक वर्णन !!!वसंत के आते ही बौरा गई हवा ...भटक गई राह से ...मंजरियों मे मन न रमा तो दिशाओं को ही पियरा दिया अपने मन के पागलपन से .
    वाह !!! प्रकृति वर्णन अद्भुत !!!

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  2. आज तो सच मुच बसंत आ गया क्या शब्द क्या भाषा सभी कुछ महक रहा है बधाई स्वीकारें आभार

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  3. कविता अच्छी है .बसंत के मौसम की अभिव्क्ति सुन्दरता के साथ किया गया , है शब्दों का चयन अच्छा है .........!!!!

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  4. बहुत सुन्दर कविता.मलय पवन की भटकन मन को भाई. बधाई.

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  5. बहुत सुन्दर । प्रकृति के सौन्दर्य से भरपूर रचना।

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  6. प्राकृतिक सौन्दर्य से और सुन्दर भाव से ओतप्रोत सुन्दर रचना.

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  7. हे! तुमको तो बसती पवन का पूरा पूरा हाल मालूम है . मद कलश सी कलियाँ और सुर्ख पलाश ! किधर से चली किधर को गयी कहाँ अझुराई. कौन नहीं अझुरायेगा !!!! ...अझुराएगी तभी तो महकेगी हम तो चकित हैं बसंती पवन के महकने का राज़ जानकार . सखी ! बसंती पवन की कसम !बहुत महक रही है तुम्हारी लेखनी !!!!!! दिल से बधाई .

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  8. बहुत सुन्दर लय है ..इस लय ने बान्ध लिया ।

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  9. चकित चित्त सी चैत में लौटी ,

    bahut sundar usha ji

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  10. अब तो भूल गई गंतव्य ,
    वासन्ती फागुन में बौराई !
    चकित चित्त सी चैत में लौटी ,
    चहुँ दिसी फ़ैल रही पियराई !


    वाह ! कितनी मीठी दिल को छू जाने वाली पंक्ति है...
    मन को मोह ले गई , ये रचना ...
    बधाई स्वीकारें !!!!

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  11. prakriti ke drishy ko jeevant arane vaali kavita ke liye badhai. durg me aapse milana sachmuch nai usmaa se milana ho gaya..

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  12. गंधाई ,बौराई,पियराई ,वाह क्या अर्थ पूर्ण शब्द अपनी कविता में पिरोये है .कविता में खुशबु है रंगत है

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  13. आप सबने इस कविता को पसंद किया सराहा मै आप सबकी बहुत आभारी हूँ ! बहुत बहुत धन्यवाद !

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