गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

दिग्दाह
सूरज ने सोखे हैं ,
बूंदों के साथ
धुएं की काली लहरें !

लहरों की लपटों से
व्याकुल हुए जलधर
उखड गये जंगल
बेबस हुए विषधर

सिमट चलीं नदियाँ
बेहाल हुए जलचर


क्षितिज पर फ़ैल गया
शायद विस्फोट के बाद का रुधिर ,

और होने लगा है दिग्दाह !!!
मौन हैं दिशाएं
चिंतित सी देखती है ,
चतुर्दिक बदलाव को !

लहलहाती फसलें गिरने लगी हैं ,
ओला नहीं था पाला नहीं था ,

ऐसे तो मरना जाना नहीं था
पानी संग गिरते है ,
कीड़े मकोड़े धडकते हुए ,
बेजान फलियों से पटने लगा है खेत !

दूर कहीं रोने का स्वर

अन्न -जल पर छाया है ,
कैसा ये संकट !

18 टिप्‍पणियां:

  1. क्या खूब उकेरा है दर्द. हर शब्द अपना दर्द बयां कर रहा है. पर कब थमेगा ये सब ?

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  2. क्षितिज पर फ़ैल गया
    शायद विस्फोट के बाद का रुधिर ,
    और होने लगा है दिग्दाह !!!
    मौन हैं दिशाएं
    चिंतित सी देखती है ,
    चतुर्दिक बदलाव को !..... sthiti ke dard ko chitrit karti rachna

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  3. बाग फूलों से,सितारों से गगन जलता रहा
    बर्फ के मौसम में धरती का बदन जलता रहा.
    उषा ! तुमने आज के यथार्थ को अपनी कलम के जरिये
    कैद कर दिया,
    समय जैसे ठहर गया हो,
    दिशाएँ जैसे सहम गयी हों,
    अन्न जल के बिना जीवन कहाँ???

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  4. दिग्दाह !! दूर रोने का स्वर छाया है ये कैसा संकट अन्न -जल पर छाया है .. इतने बड़े कैनवास को तुमने इतनी गहरी संवेदना से उकेरा है कि आदि कवि की पीड़ा आकार लेने लगी .बहुत अधिक है अँधेरे इसीलिए तो दिशाएं मातम मना रहीं हैं और दिग्दाह हों रहा है . उन अंधेरों में तुम्हारी कविता से रोशनी फूटती लग रही है . तुम्हें दिलसे बधाई .

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  5. बेहतरीन प्रस्तुति
    बधाई ................

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  6. बहुत सहज स्वाभाविक चिंता व्यापत है इस कविता मे पर्यावरण के प्रति ।

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  7. दूर कहीं रोने का स्वर
    अन्न -जल पर छाया है ,
    कैसा ये संकट ...

    गहरी संवेदना .. गहरा चिंतन है आपकी रचना में .. विनाश का पर्यावरण इंसान ने खुद ही फैलाया है और वो ही भुगतने को खड़ा है आज ...

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  8. एक साथ सुरसा मुखी महंगाई, पर्यावरण विनाश कार्य क्रम और आतंकवाद के वास्तविक चित्र उकेरती आपकी यह रचना कई अर्थों में महत्वपूर्ण है
    लेकिन, "बेबस हुए विषधर" यह पंक्ति समझ से परे रही

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  9. aaj hi aapka blog dekh. khushi hui. marm ko sparsh karati kavita k liye badhai.

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  10. बार बार हाशिये पर जा कर , कविता पुनह केंद्र में लौट आती है ! कविता के द्वारा हम चिंताएं ही तो बांटते है ! मेरे सभी अपनों का बहुत बहुत धन्यवाद ! नारदमुनी जी ,शरद कोकास जी बहुत दिनों के बाद आये ,कृपया आते रहें !
    गिरीश पंकज जी !की मै बहुत आभारी हूँ ,आपका स्वागत है !
    श्याम जी !बेबस हुए विषधर ' का मतलब यह है कि प्रदुषण का जहर इतना ज्यादा हो गया है , कि उनके अस्तित्व को भी खतरा हो गया है ! धन्यवाद सहित उषा !

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  11. आपको व आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ

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  12. आपको और आपके परिवार को होली की बहुत बहुत शुभ-कामनाएँ ...

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  13. प्रकृति और मनुष्य की चिंता, सुन्दरता से.

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  14. आपकी कविता वाकई मे बहुत ही सुन्दर हॆ पहले तो मेरे भी समझ मे "बेबस हुए विषधर " नही आया पर आपके स्पष्टीकरण से बात स्पष्ट हो गयी धन्यवाद

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  15. आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद !
    उम्मीद है आगे भी मुझे आप सबका सहयोग मिलता रहेगा !

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  16. दिल से लिखी हुई और दिल को छूती हुई रचना ||
    हर शब्द अपना दर्द बयां कर रहा है ...

    बहुत सुन्दर......

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