गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

बुढ़ापा

निचुड़ गया है
रस जीवन से जैसे
जैसे धान पुआल से
सब कुछ खो गया अब ,
नहीं जो खोई
देंह बोझ है
उजड़ी सी खाली एक हवेली
बेवजह सुबह हुई
सताती रात आती है
ख़त्म हुईं उम्मीदें सारी
आँखे बिना तेल की बाती हैं !

11 टिप्‍पणियां:

  1. रस से निवृत होना ही बुढ़ापा है बढ़िया व्याख्या.

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  2. ख़त्म हुईं उम्मीदें सारी
    आँखे बिना तेल की बाती हैं ...
    सच है बुढ़ापा अभिशाप है अपने आप में ......... ऐसा दीप जिसकी लो नही होती .......... बहुत संवेदनशील लिखा है

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  3. वाह वाह !!!! क्या बात है यार !!!! जीवन की संध्या वेला को तुमने क्या खूब चित्रतित किया है .....................,
    हो गये सम्बन्ध जर जर क्या करें ?
    कांपते मन प्राण थर थर क्या करें ?

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  4. बुढापे में जीवन के प्रति एक खीझ और गुस्सा भी होता है . जी लेने के बाद उसके सार तत्व अर्थहीन होते हैं इस नश्वरता से वाकिफ रहते क्या बुढ़ापा बिना तेल का दिया होता ?
    बेवजह सुबह हुई
    सताती रात आती है
    कम से कम शब्दों में कविता ये सब कुछ कह रही है . बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति है . तुम्हें दिल से बधाई

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  5. बड़े दिनों के बाद दर्शन दिए पर सार्थक. जीवन संध्या का सटीक चित्रण और व्यथा की कथा. मन आहत तो होता है पर हम सबको उससे हो कर एक न एक दिन तो गुजरना ही पड़ेगा

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  6. बहुत सुन्दर पोस्ट सच्चाई बयां करती हुई
    आभार ..............

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  7. एहसास की यह रचना
    सुन्दर

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  8. bahut sunder ....
    jaise dhan se puaal....
    wah...is vidambna ka satya swrup
    badhai...keep going.

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  9. लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है ।

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