गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

दिग्दाह
सूरज ने सोखे हैं ,
बूंदों के साथ
धुएं की काली लहरें !

लहरों की लपटों से
व्याकुल हुए जलधर
उखड गये जंगल
बेबस हुए विषधर

सिमट चलीं नदियाँ
बेहाल हुए जलचर


क्षितिज पर फ़ैल गया
शायद विस्फोट के बाद का रुधिर ,

और होने लगा है दिग्दाह !!!
मौन हैं दिशाएं
चिंतित सी देखती है ,
चतुर्दिक बदलाव को !

लहलहाती फसलें गिरने लगी हैं ,
ओला नहीं था पाला नहीं था ,

ऐसे तो मरना जाना नहीं था
पानी संग गिरते है ,
कीड़े मकोड़े धडकते हुए ,
बेजान फलियों से पटने लगा है खेत !

दूर कहीं रोने का स्वर

अन्न -जल पर छाया है ,
कैसा ये संकट !

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

बुढ़ापा

निचुड़ गया है
रस जीवन से जैसे
जैसे धान पुआल से
सब कुछ खो गया अब ,
नहीं जो खोई
देंह बोझ है
उजड़ी सी खाली एक हवेली
बेवजह सुबह हुई
सताती रात आती है
ख़त्म हुईं उम्मीदें सारी
आँखे बिना तेल की बाती हैं !