शनिवार, 2 जनवरी 2010


बज्जर

लहरें
हर बार ,
सिर धुन लेती हैं ,
इन सूखी काली चट्टानों को देखकर !

पुरानी काई से लिपटा हुआ,
जाने कबसे रेंगते है यहाँ ,
केकड़े बिच्छू और कीट


पसीजेंगे कभी क्या ,
खुल के भींगेंगे ये ,
सफेद चमाचम लहरों में !

मीलों सफ़र करती ,
सागर को पूरती,
मोती लुटाती लहरें ,
झाग बनकर रह जाती हैं ,
इनसे टकराकर !

सागर में रहता हुआ ,
अवरोध सा ,
हृदय हीन शोक हीन ,
यह नीरस बज्जर !

बदलेगा कभी क्या ,
जीवन बीता जा रहा है !

आप सबको नव वर्ष २०१० की हार्दिक शुभ कामनाएं !

15 टिप्‍पणियां:

  1. सागर में रहता हुआ ,
    अवरोध सा ,
    हृदय हीन शोक हीन ,
    यह नीरस बज्जर !
    बहुत भावपूर्ण है आपका ये बज्जर जिसमें ऊष्मा भी है अहसास भी आपको व आपके परिवार को नूतनवर्षाभिनंदन

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  2. बज्जर ...
    ऐसे ही ज़िन्दगी से कुछ गैर जरूरी चीजें चिपकी ही रहती है परन्तु रुकता क्या है... समय की उजली पांखों से बचपन की धुंधली पांखें अब भी बेहतर दिखाई देती है.
    नए साल में आपके लिए मंगल कामनाएं.

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  3. क्या बात है ऊष्मा जी ! यह बज्ज़र तो हूबहू हमारे समाज का प्रतीक बन गया है ..कितनी कितनी लहरें रोज चली चली आती हैं इसे सीझने ..चिकने पर कोई असर ही नहीं ..आपकी यह कविता बहुत से अर्थों में खुलती है... अपने ब्लॉग "viklap1950 " में "विलोम भाव" शीर्षक से कुछ पंक्तियाँ दर्ज की हैं ..इसी भाव को व्यक्त करती हुई .. उन पर आपका ध्यान चाहूँगा ...

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  4. पांच बार आपकी यह कविता पढ़ी हर बार नई झनझनाहट के साथ ... कभी कभी आप कमाल कर जाती हैं ..पर फोटो बीच में नहीं जच रही .. इसे ऊपर होना चाहिए ...

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  5. एक एक पंक्ति.. एक एक शब्द सटीक.. अपनी जगह पर मुस्तैद लामबंद..कोई विचलन नहीं कोई विपथन नहीं .. एक सचमुच कि वाह! के साथ यह तीसरी टिप्पणी

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  6. बेहतरी रचना के लिए
    बहुत -२ आभार

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  7. पसीजेंगे कभी क्या ,
    खुल के भींगेंगे ये ,
    सफेद चमाचम लहरों में !
    बज्जर तुम्हारी कविता कठिन समय की कठिन कविता है ...इन बज्जरों से टकराने का हौसला रखती तुम्हारी कविता सागर की लहरों की तरह फेनिल हैं लेकिन फौलादी अर्थ लिए यह हर पल चौकस जूझने को तैयार खड़ी है . ह्रदय के भीतरी उद्गारों से शुभ कामनाएं !

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  8. नये साल की आप को हर्दिक शुभकामनाये ऐसे ही
    पूरे साल लिखते रहिये
    ह्रदयस्पर्शी रचना बेजोड़

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  9. सागर में रहता हुआ ,
    अवरोध सा ,
    हृदय हीन शोक हीन ,
    यह नीरस बज्जर ....

    सच में ये ह्रेदय हीन बज्ज़र कभी नही बदल पाएगा ...... हमारी सोच ....... कुछ घिसी पिटी मान्यताएँ भी शायद नही बदलेंगी इस बज्ज़र की तरह ......... बहुत गहरी सोच से लिखी रचना है ........ आपको नाव वर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाएँ ........

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  10. ''बदलेगा कभी क्या
    जीवन बीता जा रहा''
    कितना बड़ा सवाल है ! समय के पत्थरों पर जयगान लिख दो .....बना दो मील का पत्थर स्वयं को .
    तुम ऐसा कर सकती हो ,तुम्हे ऐसा करना ही होगा उषा !

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  11. बज्जर कविता हृदय स्पर्शी और मर्मस्पर्शी है !पुरानी काई में लिपटा हुआ है केकड़ा बिच्छू और कीट और साथ ही समाज भी !उषा जी कुछ ऊष्मा और डालिए कि समाज बदले !
    नव वर्ष की मंगल कामनाओं के साथ -- मुक्ता शर्मा (पमपम )

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  12. इक अच्छी कविता...चट्टान को आपने सजीव कर दिया...

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  13. बेहतरी रचना के लिए
    बहुत -२ आभार

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  14. आप सबने इस कविता को ,
    सराहा और अपनी टिप्पणी से नवाजा !
    मै आप सबकी बहुत बहुत आभारी हूँ !
    ये कविता मै प्रज्ञा को समर्पित करती हूँ ,
    यह कविता मेरी कन्या कुमारी की इसी
    फोटो पर की गई टिप्पणी से उदभूत हुई है !
    टिप्पणी --ये चट्टानें भीगती नहीं इसीलिए पिघलती नहीं!!!
    आभार सहित उषा !

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