शनिवार, 2 जनवरी 2010


बज्जर

लहरें
हर बार ,
सिर धुन लेती हैं ,
इन सूखी काली चट्टानों को देखकर !

पुरानी काई से लिपटा हुआ,
जाने कबसे रेंगते है यहाँ ,
केकड़े बिच्छू और कीट


पसीजेंगे कभी क्या ,
खुल के भींगेंगे ये ,
सफेद चमाचम लहरों में !

मीलों सफ़र करती ,
सागर को पूरती,
मोती लुटाती लहरें ,
झाग बनकर रह जाती हैं ,
इनसे टकराकर !

सागर में रहता हुआ ,
अवरोध सा ,
हृदय हीन शोक हीन ,
यह नीरस बज्जर !

बदलेगा कभी क्या ,
जीवन बीता जा रहा है !

आप सबको नव वर्ष २०१० की हार्दिक शुभ कामनाएं !