रविवार, 12 दिसंबर 2010

नयना


नैनी ताल की
यह नयना कर झील
देखती रहती है ,
गम्भीर होते दृढ चित्त
पहाड़ को पति वत !
हरे भरे लम्बे होते
स्वस्थ पेड़ों को पुत्रवत !
गुन गुनाती बादलों के संग
दिल खुश हवाओं को पुत्रीवत !
और सबसे बाते करती ,
स्नेह जल से बांधती
आँखों के एक कोर से
दूसरी कोर तक डबडबाई ,
पर बिना छलके ,
मन्त्र मुग्ध कर देती है !
अपनी अबूझ जादू से
मन मोह लेती है स्त्रीवत !
नैनी ताल की यह नैना कार झील !

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

द्वीप


द्वीप

साफ सुथरी सडक की तरह ,
नहीं जिन्दगी !
मेरे हाथ की रेखाओं
शांत रहना !

रेखाओं की तरह कुछ
कुछ द्वीप हैं मेरे ,
जो जैसे भी हों
हृदय के करीब हैं !

बहुत भूलती हूँ ,
यूँ ही कभी प्रेम में
सृजन में और
प्रतिफलित वर्तमान में !

लोग कहते हैं ,
भूलना अपने आपको
धोखा देना है ,
पर जबरन भूलती हूँ मै !

द्वीप के चारो ओर
सटे रहते हैं,
तरह तरह के डर
खतरे और अफवाहें !

अपनी अंतरंगता और
एकाकीपन में जानती हूँ ,
ये हरे भरे द्वीप
बचा लेते हैं जिन्दगी को !

ऐसा नहीं कि दुआएं न थी ,
अपने न थे ,
ऐसा भी नहीं कि
ये आगे न होंगें !

बावजूद इसके ,
ये द्वीप ही मेरे हैं ,
जिन पर संकटाग्रस्त
वक्त बेवक्त पहुंचती रही हूँ !
और अपने आप से मिलती रही हूँ मै !

शनिवार, 13 नवंबर 2010

मेरे गुरु डा ०अब्दुल बिस्मिल्लाह को आज कथाक्रम सम्मान से सम्मानित किया गया है !मुझे उनका साहित्य बहुत पसंद है ! उनकी एक कविता प्रस्तुत करती हूँ !

वे और उनके बच्चे

कपास के सारे पौधे हमने
टोपियों के लिए चुन लिए
और वे
लंगोटियों का ख्वाब देखते रहे !

वे इंतजार करते रहे
कि बालियों का दूध जमें
और हमने उन्हें
मदिरालय के लिए
तोड़ लिया !

हम हवा में भरते रहे खुशबु
और वे कर्ज मांगते रहे साँस

वे सोचते रहे
कि हम जरा मुस्कराएँ
और हम
उनकी मूढ़ता पर खिलखिलाते रहे !

हम अपने बच्चों को
पटाखे दिलवाते रहे
और उनके बच्चे
बंदूक चलाना सीख गये !

बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

सिली माचिसे



सिली माचिसे

सिली माचिसों की तरह ,
गलियों और सडकों पर घूमते हैं बच्चे
सदियों की सीलन सवार है ,
उनकी कच्ची उम्र के सीने पर !
घरों के पीछे टूटी छतों के नीचे ,
हमारी लापरवाही और बेरुखी ,
झुनझुने की तरह बजाती है उन्हें !

वह धूप जो तय थी उनके लिए ,
शायद किसी चांदनी के ,
साये में पलने लगी है अब !

ज्यादा नहीं बस ,
एक ही साँस चाहिए ,
तबियत भर गर्म सी !
भूख में रोटी सी ,
खेल में जीत सी ,
ठिठुरन में माँ की गोदी सी !

ठनठनाते सिक्के की तरह ,
बजने लगेंगी सिली माचिसें ,
और जल जायेंगे असंख्य दीप
इन गरीब तंगहाल उदास अंधेरों में !

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

मै समाचार हूँ

मैं समाचार हूँ जनहित में जारी
मुझे सुनते ही सक्रिय हो जाते हैं ,
दो मुहें सर्प और फटी जीभ वाले !

जगह जगह फ़ैल जाते हैं
टेढ़ी चाल चलने वाले ,
जहर बुझी बातों वाले ,
धुएं के गुबार उड़ाने वाले ,
अपनेपन का हाथ रख
गर्दन दबाने वाले !

मैं खड़ा हूँ सडक पर
लिए निजता और शुभता
डटा रहूँगा निहत्था ही

जब तक की वे जाग नहीं जाते
जिनके हित के लिए ,
मेरा प्रयास है निरंतर ,
मै समाचार हूं ,
जनहित में जारी !

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

स्वीकार लो मुझे

तुम कैसे मिलीं मुझसे
जैसे मिलती है ,
गोरी सुबह सांवली रात से !
आधी रात के बाद ,
गाये जाने वाले राग की तरह
मेरे भीतर अंगड़ाई लेती है ,
एक भरपूर उडान !
विरह की दर्दीली धुन की तरह ,
समा गयी हो तुम
मेरे पोर पोर में !
दिनों रात चलती है एकतानता !
कहीं कुछ और नहीं
तकदीर ने हमें मिलाया
और थमा दिए हैं पंख ,
अब न कोई है न कोई होगा ,
मेरे जितना ,मेरे जैसा
तुम्हें चाहने वाला !
स्वीकार लो मुझे !

शनिवार, 21 अगस्त 2010

सब सही कैसे हो सकता है


सब सही कैसे हो सकता है ,
भूमि के गर्भ में है ,
अंधकार गंदगी बदबू ,
सड़न और उबन,
जिसमें पलता हुआ बीज,
तेजी से अंकुआ के निकलता है ,
हरे भरे पौधे के रूप में !
वह बार बार स्मृतियों में डूब जाता है !
शायद वही रहता है उसके साथ ,
भय चिंता और घबराहट में ,
जड़ से उखड़ते उखड़ते
कहाँ आ पहुंचा है वह !
बूढी सदी थक गई है ,
पीठ पर उठाये ग्लोब !
लथपथ सी हांफती ,
जा रही है अनंत की ओर !
सब सही कैसे हो सकता है !

रविवार, 1 अगस्त 2010

उसका सपना

एक्वेरियम में ,
चटुल मछलियों की तरह
उसकी सोती आँखों में
तैरते हैं बेखौफ सपने !

चंद घंटे की रात ,
फेरती है गाढे रंग
और एक मीठी धुन
उसके बदरंग दिन पर !


बेहिसाब सालों से ,
बर्तन मांज मांजकर
घिस चुके हाथों में
लरज जाती है मेंहदी


दूर कहीं सरसराता है ,
लाल रेशमी दुपट्टा
मींठी आंच की लहक पर
पलता है एक सपना !


पलकों के उधड़ते ही
बढ़ जाता है दिन का दबाव
और सिकुड़ जाती हैं भवें
शादी का खर्चा जोड़ते जोड़ते !



बुधवार, 23 जून 2010

रुई


रुई

चलता है चरखा !
अहर्निश.........
कपास की रुई
का ताना बाना !

सूत का गोला ,
पचरंगी चोला ,

यादों में
टिमटिमाती है ,
उजली उजली ,
साँची साँची रुई !


चोले के मन को
रंग बिरंगे सपने ,
सुरों की उठान
सौंप जाती है रुई !


अवसाद सोखते
पुराने पड़ते ,
कपड़े के मन
को अक्सर
हल्का कर
जाती है रुई !

शुक्रवार, 28 मई 2010

ताले


प्यार किया है मैंने,
उन लोंगो से ,जिनके जीवन में
बाहर निकलने के रास्ते में ,
कहीं कहीं पड़े है छोटे बड़े ताले !

पास रह के भी नहीं खुलते ,
अपनाने पड़ते हैं टेढ़े मेढ़े रास्ते !
पाप बताते , नरक रचते हैं
ये मन के बेवजह ताले !

सोने चांदी और लोहे ,
के ताले जिनमें बंद हैं ,
खुशियों की खिलखिलाहट
और रौशनी के झरने !

वह अनुभूति की दिव्यता ,
जिसे सर झुका के
हम मान लेते है
स्वीकारोक्ति से भर जाते हैं !

तालों के खुलने से ,
खुल जाती है नई दुनियां ,
सूरज के सामने जाते हैं
देखते हैं नई चीजें ,पुराने सरोकारों में !

अंकुरण से फल फूल तक ,
वसंत से पतझड़ तक
समझ में आता है जीवन ,
बहती हुई जीवन सरिता !

पल पल , हर पल
बदलता है जीवन जहाँ
हमने क्यों लगा रखें हैं ,
अनगिनत ताले वहाँ

गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

नदी और हम



नदी तुम परंपरा हो
गीतों की कड़ियों में,
सोलह संस्कारो में ,
देव सिद्ध जैन बौद्ध और,
आक्रान्ताओं की भी साक्षी !


आह्लादित करती बहती रहती हो !
बदले में तुम्हे मिटाने को आतुर हम
हे परम्परा मयी
क्षमा करो !


नदी तुम गरिमामयी हो
समा लेती अपने में
समूची माटी मानव की !
पूर्ण अपूर्ण मनोरथ के
बचे हुए कचरे को !


जलतरंगिणी बजती रहती हो
बदले में तुम्हे सुखाने को आतुर
हे गरिमामयी
क्षमा करो !


नदी तुम वामा हो
सोलह कलाओं से
रिझाती चाँद को
युगों तक बसाये रखती
हृदय के निर्भ्रान्त कोने में



हिलोरे लेती सजती रहती हो
बदले में व्यभिचार को आतुर हम
हे समर्पिता
क्षमा करो !







शनिवार, 17 अप्रैल 2010

~धमक ~

सपनों और हकीकत के ,
रहस्यमय प्रकाश में
बढती जा रही उनकी धमक !

आती हैं आवाजें
लार सने दांतों की ,
घात की ताक में,
पोज बदलते पंजों की !
लहकती हैं भेस बदलती ,
नीली लपटें उनकी ओर !

पोर पोर सिहर जाता
नर्म नाजुक सा दिल
डर से भर जाता !

किसी भी वक्त
उतर जायेगा अँधेरा ,
रक्त मांस के आखिरी छोर तक !

सब नजर अंदाज करती ,
बढती जा रही उनकी धमक !

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

जिजीविषा

उडती पतंग
हवाओं के बिगड़ते ही ,
डगमगा जाती है !
बदनीयती काट देती है ,
उसे जड़ से !
निराधार सी चल पड़ती है ,
अनजानी दिशा की ओर !
ठूंठों की संगत में
ठहर जाती है उसकी दुनिया !

रहा करती थी आसमान में जो
हथेलियों में सिमट जाती है
आँखे मूंद लेती है जिन्दगी से !

जब की दामन में ,
उसके बची रहती है
थोड़ी सी नोक ,
थोड़ी सी डोर ,
खुला आसमान
और उड़ानेच्छा !

गुरुवार, 25 मार्च 2010

महिला सशक्तिकरण का ऐतिहासिक मोड़

मार्च २०१० का दिन निश्चित रूप से ऐतिहासिक दिन था ,जब राज्यसभा ने शाम ७बजकर पचीस मिनट पर हुएमतदान में १०८ वें सम्विधान संशोधन विधेयक के रूप में महिला आरक्षण विधेयक बिल को एक के मुकाबले १८९मतों से पारित कर दिया !!! निश्चित रूप से वे सभी लोग धन्यवाद के पात्र हैं , जिन्होंने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप सेइस विधेयक को पारित करने में मदद की !
महिलाओं को राजनितिक रूप से सशक्त बनानेके लिए इस विधेयक की यात्रा लगभग १४ साल पुरानी है ! इसे लागूकरने के लिए समय समय पर प्रयास किया गया ! - १२ सितम्बर १९९६ देवगौड़ा सरकार द्वारा - १४ दिसम्बर१९९८ वाजपेयी सरकार द्वारा - २३ दिसम्बर १९९९ वाजपेयी सरकार द्वारा प्रयास किया गया ! परन्तु पेश होने सेपहले ही उसकी विफलता का अनुमान लगाया जा चुका था ! यह सुखद संयोग हुआ कि यह बिल मार्च २०१० कोपास हुआ !
स्त्री पुरुष की असमानता को देखते हुए विश्व के १३४ देशों में हुए, एक अध्ययन के अनुसार भारत ११४ वें क्रम परआता है ! विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के राज्यसभा तथा लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व क्रमशः तथा : ही है !!! हिंदुस्तान अख़बार के अनुसार आजादी के बाद से संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सातप्रतिशत से भी कम रहा है !!!
अब आइये देखते हैं कुछ विचार --- १९३१ में भारत के नये सम्विधान की रचना के लिए लन्दन में
बिटिश हुकूमत द्वारा बुलाये गये दूसरे गोलमेज सम्मेलन में गाँधी जी ने कहा था कि ---"मै उस विधायिका काबहिष्कार कर दूंगा ,जिसमें महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व प्राप्त हो ! " वे अक्सर कहा करते थे कि -- जबअबला सबला बन जाएगी तो सभी वंचित लोग शक्तिशाली बन जायेंगे ! इसी प्रकार डा. राम मनोहर लोहिया आजादभारत में स्त्री पुरुष समानता को अपना सबसे बड़ा ध्येय मानते थे ! वे कहते थे कि -आजाद हिंदुस्तान में हरआदमी राजा होगा मर्द भी और औरतें भी ! औरते अपने हक़ से राजा होंगी ,राजा की पत्नी होने के नाते रानी नहीं ! महिला परिवार की धुरी है ! इसलिए महिला सशक्तिकरण का होना जरुरी है !आज के प्रगतिशील युग में अनेकआर्थिक कार्यों में महिलाओं का योगदान बढ़ रहा है ! मशहूर अर्थशास्त्री अमर्त्यसेन का कहना है कि --
" यदि औरतों को अधिक अधिकार मिले तो गरीबी से अधिक तेजी से लड़ा जा सकता है ! "
कितनी अजीब बात है कि महिलाएं समाज के लगभग आधे भाग का प्रतिनिधित्व करती हैं ,लेकिन
उनकी राजनितिक सहभागिता लगभग नगण्य रही है ! आज आजादी के पचास साल बाद भी उनके विकास किप्रक्रिया काफी धीमी है ! किसी भी देश का समग्र विकास तब तक नहीं हो सकता जब तक कि उसकी आधी जनसंख्या अर्थात महिलाएं विकास से अलग रहें ! पुरुष और महिला के बीच असमानता की खाई को पाटने कीआवश्यकता है !यह तथ्य हम सभी को स्वीकार करना होगा कि महिलाओं में उर्जा है ,शक्ति है , वे दूरदृष्टि रखती हैं !
अतः महिलाओं कि भागीदारी के बिना पूर्ण विकास असम्भव है ! जब तक हम महिलाओं की निर्णय क्षमता , कुशलता योगदान व् अधिकारों का सम्मान नहीं करेंगे ,तब तक उनको विकास प्रक्रिया से नहीं जोड़ा जा सकता है
मुझे उम्मीद है कि महिला
: सशक्तिकरण के इस ऐतिहासिक मोड़ पर आप सब साथ देंगे !

बुधवार, 10 मार्च 2010

समीरा

मलयाचल से चली समीरा
शत शत पंखों वाली !

सुर्ख पलाश के फूलों में ,
मन्त्र विद्ध सी अरुझाई !
मद कलश कली कुंड में ,
छककर
गोते खाई !
ताड़ वन से पीया दूध ,
और
पाकड़ बरगद में पुष्टाई!
दानामरुआ बनतुलसी ,

आम्रबौरों में घूम घूम गंधाई !
अब तो भूल गई गंतव्य ,

वासन्ती
फागुन में बौराई !

चकित चित्त सी चैत में लौटी ,
चहुँ
दिसी फ़ैल रही पियराई !





मंगलवार, 9 मार्च 2010

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

दिग्दाह
सूरज ने सोखे हैं ,
बूंदों के साथ
धुएं की काली लहरें !

लहरों की लपटों से
व्याकुल हुए जलधर
उखड गये जंगल
बेबस हुए विषधर

सिमट चलीं नदियाँ
बेहाल हुए जलचर


क्षितिज पर फ़ैल गया
शायद विस्फोट के बाद का रुधिर ,

और होने लगा है दिग्दाह !!!
मौन हैं दिशाएं
चिंतित सी देखती है ,
चतुर्दिक बदलाव को !

लहलहाती फसलें गिरने लगी हैं ,
ओला नहीं था पाला नहीं था ,

ऐसे तो मरना जाना नहीं था
पानी संग गिरते है ,
कीड़े मकोड़े धडकते हुए ,
बेजान फलियों से पटने लगा है खेत !

दूर कहीं रोने का स्वर

अन्न -जल पर छाया है ,
कैसा ये संकट !