रविवार, 1 नवंबर 2009

दरवाज़ा

आओ दुल्हन !
मै भी तुम्हारा स्वागत करता हूँ !
चाहे डलिया मे डग भरती आओ ,
या फिर मखमली अहसास लिए ,
लाल दरियों पर पग धरती आओ ,
कि अब आना जाना आसान नहीं !
जान ही जाओगी तुम भी औरो कि तरह ,
भीतर बाहर के फर्क को !
घर के लोग करें न करें ,
मै वादा करता हूँ ----
खुल जाऊंगा दोनों तरफ ,
जब तुम चाहो !
ठीक तुम्हारे प्रेमिल मन कि तरह !!!

15 टिप्‍पणियां:

  1. दरवाज़े का वादा सबसे प्यारा उपहार

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  2. खुल जाऊंगा दोनों तरफ ,
    जब तुम चाहो !
    ठीक तुम्हारे प्रेमिल मन कि तरह
    दरवाज़ा स्त्री को बहुत अच्छी तरह जानता है .स्त्री की हर लड़ाई का वह साक्षी है .. स्त्री दरवाजे के भीतर रहे या बगावत करे .. मुद्दा दरवाज़ा ही बनता है .. . वही दरवाज़ा स्त्री के प्रति इतना सवेदनशील और सदाशयी है दरवाज़े के माध्यम से बहुत मर्मस्पर्शी बात कही है तुमने . ह्रदय से बधायी स्वीकारो . ...

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  3. बहुत सुन्दर ...... यदि हर पति भी darwaaje की तरह इस बात की pahal करे तो दुनिया ही बदल जाए .......

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  4. आपकी ये रचना विलक्षण है.. शीर्षक न हो तो संप्रेषण बाधित हो जाता है.. लेकिन शीर्षक पर ध्यान जाते ही कविता अपने विलक्षण सौन्दर्य के साथ घूंघट खोलती है .. यह दूसरी पंक्ति "मै भी तुम्हारा स्वागत करता हूँ !" में केवल स्वागत है या केवल स्वागत भी ठीक था ..लेकिन यकीन मानना दरवाज़े पर इतनी सुन्दर रचना मैंने नहीं देखि आज तक
    "कि अब आना जाना आसान नहीं !
    जान ही जाओगी तुम भी औरो कि तरह ,
    भीतर बाहर के फर्क को !"--vyarth ki varjnaon ke vyakaran par behtreen chot

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  5. मै वादा करता हूँ ----
    खुल जाऊंगा दोनों तरफ ,
    जब तुम चाहो !
    ठीक तुम्हारे प्रेमिल मन कि तरह !!!

    अनुपम, अद्वितीय, मर्मस्पर्शी कविता.कितना अलग सोच लेती हैं आप ऊषा जी!!!

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  6. आपकी कविता ने स्त्री की भावना को दरवाजे से जोड़ कर नयी परिभाषा दे दी है .... स्त्री की हर लडाई का सख्शी है ये दरवाजा ...प्रज्ञा ने बिलकुल सही आंकलन किया है

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  7. मै ख़ुशी से फूले नही समा रही हूँ !
    आप सबकी टिप्पणी देखकर !
    ये गांठे है समस्याओं की !!!खुलती हैं ,
    तो बडी तसल्ली होती है !सही बात है की
    दरवाजा स्त्री की लड़ाई की मूक सहचर है !
    बहस आगे चलती रहे ...आभारी हूँ !!!!!

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  8. उषा जी पहले तो इतनी मर्मस्पर्शी भावपूर्ण रचना के लिए बधाई स्वीकारें
    मेरी कविता पर कविता से भी सुंदर उसकी सराहना करने और हौसला देने के लिए धन्यवाद

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  9. आओ दुल्हन !
    मै भी तुम्हारा स्वागत करता हूँ !
    चाहे डलिया मे डग भरती आओ ,
    या फिर मखमली अहसास लिए ,
    लाल दरियों पर पग धरती आओ ,
    कि अब आना जाना आसान नहीं !

    बहुत ही सुंदर है

    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    TATA INDICOM
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  10. बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
    आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन


    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  11. बहुत खुबसूरत अभिब्यक्ति जो मन को छू गई..मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है...

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  12. एक aagantuk मन की कशमकश को
    दरवाज़े के मुख से भली भांति बयान
    करती हुई सार्थक रचना
    कथ्य और शैली दोनों प्रभावित करते हैं

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  13. ''की अब आना जाना आसन नही '' या ''खुल जाऊंगा दोनों तरफ से ''............उषा ! तुमने दरवाजे के जरिये स्त्री की पूरी अस्मिता को उजाले से भर दिया है .....ऐसी सुबह जिसकी शाम नही होती . हार्दिक बधाई .

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  14. आपकी कल्पना की दाद देना चाहूंगी। दुल्हन का स्वागत ऐसे भी हो सकता है, सोचा नहीं था।
    ------------------
    और अब दो स्क्रीन वाले लैपटॉप।
    एक आसान सी पहेली-बूझ सकें तो बूझें।

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  15. drwaja drwaja na hua goya mn hogya jo apne bhitr jhankne wale ko bahon me smet le .
    bhut hi sundr our bhavnatmk manvikrn kiya hai drwaje ka .

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