रविवार, 15 नवंबर 2009

प्यास

पुराने कुएं में ,
कभी छलछला जाता है पानी ,
हौले से कोई ता तो ,
सन्नाटा टूट सा जाता !
कौन आया था ,
उस अँधेरी रात में ,
रोते हुए , आक्रोश में ,
उसकी पवित्रता के आगोश में !
डूब गया जो उसके भीतर ......
तब से ठहर गया वह
ओढ़ ली चुप्पी बदनामी की !
कि सतीत्त्व , मातृत्व ,नारीत्व
की पानिहारियां प्यासी रह गयी!
खाली खाली से मटके ,
डरी डरी ठिठोली ,
सहमी सहमी चितवन ,
की प्यास छा गयी सारी बस्ती में !
लो सूख चला एक और कुआँ !!!

रविवार, 1 नवंबर 2009

दरवाज़ा

आओ दुल्हन !
मै भी तुम्हारा स्वागत करता हूँ !
चाहे डलिया मे डग भरती आओ ,
या फिर मखमली अहसास लिए ,
लाल दरियों पर पग धरती आओ ,
कि अब आना जाना आसान नहीं !
जान ही जाओगी तुम भी औरो कि तरह ,
भीतर बाहर के फर्क को !
घर के लोग करें न करें ,
मै वादा करता हूँ ----
खुल जाऊंगा दोनों तरफ ,
जब तुम चाहो !
ठीक तुम्हारे प्रेमिल मन कि तरह !!!