शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

सच कौंधता है


नदी माँ है बच्चे ,
बिल्कुल मेरी तरह ,
प्यार दुलार
करुणा से भरी !

पर भूल के भी पूछना मत ,
उसके रास्तो के बारे में ...

समतल ,रेतीला ,पथरीला ,
पूछ सकते हो ,पर पूछना नही ...
उसकी तरलता की मात्राएँ ,
कभी नही जोड़े हाथ उसने ,

समुद्र की तरह !
भले ही सूखती रही ,
नदी फल्गु की तरह !

तारती रही मृतात्माओं को !
फ़िर धारण कर लेती ...तुम्हारी खातीर...
और सुनो !
कभी भय खाए लोंगो से मत पूछना ,
नदी के बाढ़ की कहानी !
देखभाल करना , सच ढूढ़ना ,
सच सहने की ताब रखना ,
सच को कोई सुना नही सकता ,
सच केवल कौंधता है ,
वह भी कभी कभी !

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

दीपों की तरह


सर्दी की ठिठुरन में ,
आवरण खीँच कर ,
अक्सर याद किया है तुम्हे !

और तडप कर लिखा था एक खत !
बरफ पर अपनी गर्म उँगलियों से !
साथ ही पिघलती रही ,

पढा नही वह खत शायद ,
जो खुला था आसमान में ,
पंछियों की
पांतों की तरह ,
टेढी मेढ़ी लिखावट ,

और धरती पर जले दीपों की
तरह ,
भावनाओं की जगमगाहट !

दीपावली की असंख्य शुभकामनाये....