गुरुवार, 10 सितंबर 2009



शंख हो तुम
शंख हो तुम !
तुम्हारे भीतर विराजता है एक समुन्दर ,
चांदनी बगल में लेट जाती है ,
इन्द्रधनुष सी बिखरती है हँसी,
परत दर परत झिलमिलाता है उजाला ,
कोमल बिजली सा कौंधता है रूप ,
ये तुम हो !
पूरी की पूरी शंख जैसी !!!



14 टिप्‍पणियां:

  1. चांदनी बगल में लेट जाती है ,
    इन्द्रधनुष सी बिखरती है हँसी,


    बहुत सुंदर रचना है

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  2. शंख सारे सौंदर्य का प्रतिमान है खुद में समंदर का हर रूप छुपाये ...बहुत सुंदर .. इतनी सुंदर कविता ..सच में ..बहुत सुंदर

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  3. बहुत लाजवाब कविता है यह...
    शंख के बिम्ब को जिस तरह
    आपने प्रस्तुत किया है...वो अद्भुत है.....इस कविता
    की असल खूबसूरती तो उसमे छिपी है जो
    अपने अनकहा छोड़ दिया है......अमरजीत कौंके

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  4. तुम तो ठहरे रहे झील में पानी की तरह ,
    दरिया बनते तो कहीं दूर निकल सकते थे ,
    शंख में रोप दिया मुझको हौले से ....तुमने ,
    मुक्ता बनते तो गले का हार बन सकते थे .

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  5. बहुत ही खूबसूरत कोमल रचना. लाजवाब. इतना सौन्दर्य छिपा है हर शब्द में कि केवल मौन रह कर मह्सूस करने को जी चाहता है.

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  6. बहुत सुन्दर ।

    ढेर सारी शुभकामनायें.
    hhttp://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  7. बहुत सुंदर रचना है
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  8. krishnabihari
    sankh hamare ateet ka gauravshali chinha hai.aapne use sankhnaad ki tarah bana diya hai.badhayee.
    krishnabihari
    abudhabi

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  9. अच्छी प्रस्तुति....बहुत बहुत बधाई...
    मैनें अपने सभी ब्लागों जैसे ‘मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ को एक ही ब्लाग "मेरी ग़ज़लें,मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी"में पिरो दिया है।
    आप का स्वागत है...

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  10. खूबसूरत,लरजते एहसास....समुद्र की स्वप्निल लहरों जैसे हैं

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  11. तुम्हारे भीतर विराजता है एक समुन्दर ,
    चांदनी बगल में लेट जाती है ,
    इन्द्रधनुष सी बिखरती है हँसी,
    परत दर परत झिलमिलाता है उजाला ,
    lijiye ushaji aa gaya. ukt sundar aur arthpurn panktiyon ko parhna tha to kaise na aata!
    aapki dusri kavitayeN bhi achchhi haiN. fursat eN fursat se padhuNga.

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  12. सदस्यता कैसे लेनी है ..मुझे गाइड करिये.. इन मामलों में बच्चों से भी गया गुजरा हूँ .. आपकी कवितायेँ देख रहा हूँ मुग्ध हो गया हूँ ..

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