गुरुवार, 27 अगस्त 2009

बाढ़

बाढ़
चक्र व्यूह की तरह ,
घेर लेती है हमे ,
बाढ़ एकाएक !

बाढ़ के दिन
ढोर डांगर की तरह हँकाते ,
इधर उधर टकराते
पैरों तले जमीन कहाँ ?
कदम बढायें तो किधर
कुछ कुछ बचाते उठाते
आधे अधूरे प्राण !
महसूस किया है ?
बाढ़ की रातें
कितनी भयावह !
विकराल जीभ लिए दौड़ता है काल !

देखते ही देखते ...
छाती पर चढ़ जाती है बाढ़ !
और उच्छ्वास की तरह उतर भी जाती है !
पर छोड़ जाती है बेतुकी वस्तुएं ,
दलदल ,काई ,सिवार ...
लुढ़का हुआ सिन्धौरा ,
फटी गेंद ,टूटे खिलौने ,
लथपथ पगड़ी ,हाथ की छड़ी !
बाढ़ सब कुछ निगल जाती है !
देखी है कभी ,
बची खुची बेमेल
मलबे सा घर ; मलबे सी जिन्दगी !

बेकाबू सी बाढ़ ,
निस्तेज सा सूरज !
कहाँ खो जाती..
चन्दन सी हवा !
सपना हो जाता ,
साफ पानी का घूंट !
रंग बदल देती
कोमल घास !
काठ से हो जाते ,
अपनेपन के हाथ ,
रक्तबीज की तरह बढ़ती ,
मारामारी ! फ़िर महामारी !!!

9 टिप्‍पणियां:

  1. उषा बाढ़ की विभीषिका को तुमने पूर्णता में अभिव्यक्ति दी है ..भयभीत करनेवाले बिम्बों को तुमने सरल भाषा में प्रकट किया है सराहनीय है .. भविष्य में और बहुत अच्छी कविताएन

    आएँगी पूरी संभावना के साथ प्रज्ञा

    उत्तर देंहटाएं
  2. दलाराम सहारण28 अगस्त 2009 को 1:11 am

    संवेदनाओं के साथ सृजन किया गया है। बधाई -------

    उत्तर देंहटाएं
  3. usha..nature has been all giving but when it comes to fury..its havoc,..its so vividly....created by u.my soul can feel the pain,n my heart is flooding....Pranshansa ki BADH....aa rahi hai..keep it up.

    उत्तर देंहटाएं
  4. धूप भरी छत पर
    बरस गया पानी
    आँगन में आके
    अंगीठी बुझा के
    नागिन सा लहराके
    डस गया पानी

    उत्तर देंहटाएं
  5. बाढ़ के दर्द को महसूस करती बहुत शक्तिवर
    कविता है ये...हुबहू आँखों के सामने बाढ़
    के चित्र बनने लगता है.....ऐसी सटीक पेशकारी
    के लिए मुबारक.......

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर रचना है
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुंदर रचना है
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुंदर उषा जी ,
    आपने बाढ़ अपने भावों को बखूबी पिरोया है.
    बधाई.

    उत्तर देंहटाएं