शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

ये नेत्र
धूप में बेखबर
तुम्हारे दाँतो से ,
तोड़े गये तिनकों को ,
चरते हुए मेरे ये नेत्र
हिरन हो गये

तुम्हारी छरहरी
स्निग्ध काया पर टिक,
पाए तो मेरे ये नेत्र ,
जलकबूतर हो गये
तुम्हारी मदभरी
आँखों से ,
मिले तो मेरे ये नेत्र
भ्रमर हो गये

मै तो सपनों से
कुछ कह ही रहा ,
था कि मेरे ये नेत्र
तुम्हारे हो गये


4 टिप्‍पणियां:

  1. wah ..... kya khubsurat likha hai ...मै तो सपनों से
    कुछ कह ही रहा ,
    था कि मेरे ये नेत्र
    तुम्हारे हो गये ।
    bahut sunder

    उत्तर देंहटाएं
  2. आँखों में कोई चेहरा हो ,हर गाम पे एक पहरा हो ;
    जंगल से चलें बस्ती में दुनिया को संभल कर देखें .

    उत्तर देंहटाएं
  3. आँखों में कोई चेहरा हो ,हर गाम पे एक पहरा हो ;
    जंगल से चलें बस्ती में दुनिया को संभल कर देखें .

    उत्तर देंहटाएं
  4. wonder! wonder ! USHMA
    बहुत बहुत सुन्दर पंक्तियाँ ये कविता है दिल की अंतरतम गहराई से निकलती बात और इतने मदुर शब्दों में .. कभी कभी तो आप लोग गजब ढा देते हो
    धूप में बेखबर
    तुम्हारे दाँतो से ,
    तोड़े गये तिनकों को ,
    चरते हुए मेरे ये नेत्र
    हिरन हो गये । ...तुम्हारी मदभरी
    आँखों से ,
    मिले तो
    भ्रमर हो गये ।

    उत्तर देंहटाएं