मंगलवार, 19 मई 2009

प्रभा खेतान और च्न्द्र्कीरण सुन्रेक्सा का जाना........
जो कुछ जीया.......सहा.......समझा ........
वह पीड़ा है ,जो लहू-लुहान करती है .... दुखती है ,
मौत के दरवाजे तक जा के लौटा ले आती है ,
तेजाब बनती है ......ढलती है .....कीसी जूनून में ;
बदल जाती है ; यही तो सदीयों से होता रहा है ;
लेकीन उस पीड़ा को कह देना .....अक्छ्र्श:
आंसू भरी आँखों का प्रतीकार ..............
उंगलियों का उठ जाना ....जो जीतना ही करीब ;
उतना ही बड़ा....... और वे जो लान्छ्नाये लाद के
चले गये ........ कीतनी जगह छोड़ी थी जीने के लीये....
मैंने पाया यहाँ अंजुरी भर उज्वलता ... उमंग ,
धो लीया चेहरा ......दे रही हूँ .........
भावभीनी श्रधांजली

2 टिप्‍पणियां:

  1. bahut sunder usha ..sach men in logon ne raste banaye hain jinper chalate hue hamen roshani milti hai
    hamari shradhanjali bhi arpit hai

    उत्तर देंहटाएं
  2. mai khud ko tumahre shabdon ke saath shamil karti hun............

    उत्तर देंहटाएं