रविवार, 10 मई 2009

बेचैनी

दुनीया
के समुन्दर में ,
कड़वे एहसास लीए
डूब ही जाती है,
सामर्थ्य की शीलायें-
बीतने की उभ -चूभ ,
मथे पानी का झाग ,
सोचती लोटती लहरें ,
वही तो बेचैनी है -
जो डूबने को आतुर है ...


2 टिप्‍पणियां:

  1. उषा बहुत सुंदर लिखा है.
    डूब ही जाती हैं सामर्थ्य की शिलाएं...
    बीतने की ऊभ चूभ
    बहुत सुंदर.... भाव हैं...

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  2. lahron ke saath khud ko shamil karke bhi doobne ki
    baat mat karo!!!!!!!!!sagar tak pahunchne ka haushla.........khojo.........

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