सोमवार, 4 मई 2009

धान
दूर तलक हरे भरे ,
लहलहाते धान के खेतो में ,
चमकते कण ,
गदबदाते ही रस से भर जाते है ।

हाथो में दराती लिये ,
कस के फेटा बाधे
गीत गाती धनिया
सपने नही देखती
हकीकत को मुठी में रखती है ।

सम्भाव्नायो से भरे '
धान के बेहन को
प्यार और वीश्वास से
दुलारती है '
ईश्वर से धान सी जीन्दगी मागती है ।
खूब हरे , भरे खूब लहलहाए ।




3 टिप्‍पणियां:

  1. bahut khubsorat kavita hai ...pooree mahak ke liye poora likho pls

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  2. तुम्हारी ऊष्मा से भी धान पकेगा . मुझे यकीन है

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