मंगलवार, 19 मई 2009

प्रभा खेतान और च्न्द्र्कीरण सुन्रेक्सा का जाना........
जो कुछ जीया.......सहा.......समझा ........
वह पीड़ा है ,जो लहू-लुहान करती है .... दुखती है ,
मौत के दरवाजे तक जा के लौटा ले आती है ,
तेजाब बनती है ......ढलती है .....कीसी जूनून में ;
बदल जाती है ; यही तो सदीयों से होता रहा है ;
लेकीन उस पीड़ा को कह देना .....अक्छ्र्श:
आंसू भरी आँखों का प्रतीकार ..............
उंगलियों का उठ जाना ....जो जीतना ही करीब ;
उतना ही बड़ा....... और वे जो लान्छ्नाये लाद के
चले गये ........ कीतनी जगह छोड़ी थी जीने के लीये....
मैंने पाया यहाँ अंजुरी भर उज्वलता ... उमंग ,
धो लीया चेहरा ......दे रही हूँ .........
भावभीनी श्रधांजली

शनिवार, 16 मई 2009

रविवार, 10 मई 2009

बेचैनी

दुनीया
के समुन्दर में ,
कड़वे एहसास लीए
डूब ही जाती है,
सामर्थ्य की शीलायें-
बीतने की उभ -चूभ ,
मथे पानी का झाग ,
सोचती लोटती लहरें ,
वही तो बेचैनी है -
जो डूबने को आतुर है ...


सोमवार, 4 मई 2009

धान
दूर तलक हरे भरे ,
लहलहाते धान के खेतो में ,
चमकते कण ,
गदबदाते ही रस से भर जाते है ।

हाथो में दराती लिये ,
कस के फेटा बाधे
गीत गाती धनिया
सपने नही देखती
हकीकत को मुठी में रखती है ।

सम्भाव्नायो से भरे '
धान के बेहन को
प्यार और वीश्वास से
दुलारती है '
ईश्वर से धान सी जीन्दगी मागती है ।
खूब हरे , भरे खूब लहलहाए ।