सोमवार, 27 अप्रैल 2009

औरते



सासों में ,
यादों में,
खवाबो में,
पर्दों में,
सपनो में,
परछाई में,
पत्थरों में
तन्हाइयो में,
खुबसूरत प्यारी लगती है औरते,
सच पूछो तो केवल व्ही बची है औरते।



4 टिप्‍पणियां:

  1. इसी फरेब में सदियाँ गुजार दी हमनें
    गुजिस्ता साल से शायद ये साल बेहतर हो...............

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  2. इससे पहले की इस सदी की किताबबंद हो ऐसा कुछ करें की हमारे हिस्से के सफे कोरे न छूट जाएँ !!

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  3. क्या बात है ऊषा जी. बहुत अच्छा. कृपया कमेंट बॉक्स से वर्ड वेरीफ़िकेशन हटा दें.

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