मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

~जा रे मन~


जा रे मन
छटपटाना ही तेरी नियति है !

जो तू होता अवंरा भंवरा
फूलों पर मंडराता ,
छक के करता पान मद स्नान
मिट जाती प्यास
मिल जाता चैन करार
जा रे मन,
लट पटाना ही तेरी नियति है !
छट पटाना ही तेरी
नियति है !!



जो तू होता इरही विरही
प्रिय को रोज रिझाता
खुलते बाहों के द्वार
गल जाता अभिमान
मन मिलन में एकाकार
जा रे मन,
अटपटाना
ही तेरी नियति है !
छट पटाना ही तेरी नियति है !!




रविवार, 15 नवंबर 2009

प्यास

पुराने कुएं में ,
कभी छलछला जाता है पानी ,
हौले से कोई ता तो ,
सन्नाटा टूट सा जाता !
कौन आया था ,
उस अँधेरी रात में ,
रोते हुए , आक्रोश में ,
उसकी पवित्रता के आगोश में !
डूब गया जो उसके भीतर ......
तब से ठहर गया वह
ओढ़ ली चुप्पी बदनामी की !
कि सतीत्त्व , मातृत्व ,नारीत्व
की पानिहारियां प्यासी रह गयी!
खाली खाली से मटके ,
डरी डरी ठिठोली ,
सहमी सहमी चितवन ,
की प्यास छा गयी सारी बस्ती में !
लो सूख चला एक और कुआँ !!!

रविवार, 1 नवंबर 2009

दरवाज़ा

आओ दुल्हन !
मै भी तुम्हारा स्वागत करता हूँ !
चाहे डलिया मे डग भरती आओ ,
या फिर मखमली अहसास लिए ,
लाल दरियों पर पग धरती आओ ,
कि अब आना जाना आसान नहीं !
जान ही जाओगी तुम भी औरो कि तरह ,
भीतर बाहर के फर्क को !
घर के लोग करें न करें ,
मै वादा करता हूँ ----
खुल जाऊंगा दोनों तरफ ,
जब तुम चाहो !
ठीक तुम्हारे प्रेमिल मन कि तरह !!!

शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

सच कौंधता है


नदी माँ है बच्चे ,
बिल्कुल मेरी तरह ,
प्यार दुलार
करुणा से भरी !

पर भूल के भी पूछना मत ,
उसके रास्तो के बारे में ...

समतल ,रेतीला ,पथरीला ,
पूछ सकते हो ,पर पूछना नही ...
उसकी तरलता की मात्राएँ ,
कभी नही जोड़े हाथ उसने ,

समुद्र की तरह !
भले ही सूखती रही ,
नदी फल्गु की तरह !

तारती रही मृतात्माओं को !
फ़िर धारण कर लेती ...तुम्हारी खातीर...
और सुनो !
कभी भय खाए लोंगो से मत पूछना ,
नदी के बाढ़ की कहानी !
देखभाल करना , सच ढूढ़ना ,
सच सहने की ताब रखना ,
सच को कोई सुना नही सकता ,
सच केवल कौंधता है ,
वह भी कभी कभी !

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

दीपों की तरह


सर्दी की ठिठुरन में ,
आवरण खीँच कर ,
अक्सर याद किया है तुम्हे !

और तडप कर लिखा था एक खत !
बरफ पर अपनी गर्म उँगलियों से !
साथ ही पिघलती रही ,

पढा नही वह खत शायद ,
जो खुला था आसमान में ,
पंछियों की
पांतों की तरह ,
टेढी मेढ़ी लिखावट ,

और धरती पर जले दीपों की
तरह ,
भावनाओं की जगमगाहट !

दीपावली की असंख्य शुभकामनाये....

गुरुवार, 10 सितंबर 2009



शंख हो तुम
शंख हो तुम !
तुम्हारे भीतर विराजता है एक समुन्दर ,
चांदनी बगल में लेट जाती है ,
इन्द्रधनुष सी बिखरती है हँसी,
परत दर परत झिलमिलाता है उजाला ,
कोमल बिजली सा कौंधता है रूप ,
ये तुम हो !
पूरी की पूरी शंख जैसी !!!



गुरुवार, 27 अगस्त 2009

बाढ़

बाढ़
चक्र व्यूह की तरह ,
घेर लेती है हमे ,
बाढ़ एकाएक !

बाढ़ के दिन
ढोर डांगर की तरह हँकाते ,
इधर उधर टकराते
पैरों तले जमीन कहाँ ?
कदम बढायें तो किधर
कुछ कुछ बचाते उठाते
आधे अधूरे प्राण !
महसूस किया है ?
बाढ़ की रातें
कितनी भयावह !
विकराल जीभ लिए दौड़ता है काल !

देखते ही देखते ...
छाती पर चढ़ जाती है बाढ़ !
और उच्छ्वास की तरह उतर भी जाती है !
पर छोड़ जाती है बेतुकी वस्तुएं ,
दलदल ,काई ,सिवार ...
लुढ़का हुआ सिन्धौरा ,
फटी गेंद ,टूटे खिलौने ,
लथपथ पगड़ी ,हाथ की छड़ी !
बाढ़ सब कुछ निगल जाती है !
देखी है कभी ,
बची खुची बेमेल
मलबे सा घर ; मलबे सी जिन्दगी !

बेकाबू सी बाढ़ ,
निस्तेज सा सूरज !
कहाँ खो जाती..
चन्दन सी हवा !
सपना हो जाता ,
साफ पानी का घूंट !
रंग बदल देती
कोमल घास !
काठ से हो जाते ,
अपनेपन के हाथ ,
रक्तबीज की तरह बढ़ती ,
मारामारी ! फ़िर महामारी !!!

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

ये नेत्र
धूप में बेखबर
तुम्हारे दाँतो से ,
तोड़े गये तिनकों को ,
चरते हुए मेरे ये नेत्र
हिरन हो गये

तुम्हारी छरहरी
स्निग्ध काया पर टिक,
पाए तो मेरे ये नेत्र ,
जलकबूतर हो गये
तुम्हारी मदभरी
आँखों से ,
मिले तो मेरे ये नेत्र
भ्रमर हो गये

मै तो सपनों से
कुछ कह ही रहा ,
था कि मेरे ये नेत्र
तुम्हारे हो गये


सोमवार, 27 जुलाई 2009

आखिरी गुलाब

आखिरी गुलाब .......................
सौपती हुई तुम मेरा चेहरा देखोगी ,
युद्ध के ख़त्म होने का ऐलान .....,
दिव्यता आराम और शांति की !

मेरी आखिरी नींद देखते हुए ......,
तुम मोहित सी हो जाओगी ......!

सबको दिखाओगी..कहोगी ......,
सो रही है जैसे कभी सोई नही ..!

अर्जुन की तरह बैठ जाओगी....,
रख के सारे हथियार ..उदास ...!
आखिरी गुलाब ...................,
सौपती हुई तुम बहुत कुछ कहोगी !

जन्मते ही लडकी के इर्द गिर्द ,
जहर बाँटती पूतनाओं की बातें !

लोहे के जाल बुनते ,नर्क बनाते,
गीधों कौओं की कहानियाँ ...........

दुहराओगी अपने संकल्प ...............
जैसे ही करोगी वादा अपने आप से !

पांव तले धरती खिसक जायेगी !
देख के -सब के सब अपने ही तो हैं !


आखिरी गुलाब ........................
सौपते हुए ;तुम पुकार उठोगी !!!!!


देखो ! सहती रही है ये अनवरत ,
छलावा धोखा क्रूर उपेक्षा को ...

सीमित साधनों में जीती पर
लेती थी चुनौतियां बढ़ बढ़ के ...

कहती रहती -जल में पहुंचेगे कैसे ,
काई में नहा रहे हैं .....लोग..........

थक गई है ये !अपने युद्ध से नहीं,
अच्छे लोंगो को जगाते जगाते !

आखिरी गुलाब .....................
देते हुए तुम पोंछ लोगी स्व नयन !


जब मै नहीं रहूंगी तुम्हारे साथ ,
यादें तम्हें कमजोर नहीं होने देंगी !

ये बात उभर के आएगी बार बार ,
जीने के लिए चाहिए जीने के लिए !


पॉँच गाँव जैसे पॉँच अधिकार ...
मन बुद्धि मेहनत चुनाव फैसला !

ये मिले! तो सब मुक्त हों!!जो ,
सदियों से तपित हैं शापित हैं !


आखिरी गुलाब ..................
रखते हुए तुम रोओगी तो नही न ...........

रविवार, 19 जुलाई 2009

बरसात
बरसात के झमाझम बारिश में भीगने के बाद मै वहां जाती
; जहाँ पानी कुछ देर और रुकता पानियों को उछालना ,खिलखिलाना
,
घर आकर भूल जाना ,यही थी बरसात ! एक दिन गई तो पानी थिर था
,
गम्भीर रहस्यमय आकर्षक ,
दबे
पांव झाँका वो पानी नही मेरा चेहरा था ,
पूरी
की पूरी मै भागने को हुई , की अचानक वह फ्रेम सा खडा हो गया ,
उसमे नगीने सी जड़ गई मै , अब जब -जब होती है बरसात याद आती है पानी की तरलता ,
कोमलता सहजता शीतलता ,
डरती हूँ वो पानी कहीं शीशा तो नहीं हो गया !

मंगलवार, 19 मई 2009

प्रभा खेतान और च्न्द्र्कीरण सुन्रेक्सा का जाना........
जो कुछ जीया.......सहा.......समझा ........
वह पीड़ा है ,जो लहू-लुहान करती है .... दुखती है ,
मौत के दरवाजे तक जा के लौटा ले आती है ,
तेजाब बनती है ......ढलती है .....कीसी जूनून में ;
बदल जाती है ; यही तो सदीयों से होता रहा है ;
लेकीन उस पीड़ा को कह देना .....अक्छ्र्श:
आंसू भरी आँखों का प्रतीकार ..............
उंगलियों का उठ जाना ....जो जीतना ही करीब ;
उतना ही बड़ा....... और वे जो लान्छ्नाये लाद के
चले गये ........ कीतनी जगह छोड़ी थी जीने के लीये....
मैंने पाया यहाँ अंजुरी भर उज्वलता ... उमंग ,
धो लीया चेहरा ......दे रही हूँ .........
भावभीनी श्रधांजली

शनिवार, 16 मई 2009

रविवार, 10 मई 2009

बेचैनी

दुनीया
के समुन्दर में ,
कड़वे एहसास लीए
डूब ही जाती है,
सामर्थ्य की शीलायें-
बीतने की उभ -चूभ ,
मथे पानी का झाग ,
सोचती लोटती लहरें ,
वही तो बेचैनी है -
जो डूबने को आतुर है ...


सोमवार, 4 मई 2009

धान
दूर तलक हरे भरे ,
लहलहाते धान के खेतो में ,
चमकते कण ,
गदबदाते ही रस से भर जाते है ।

हाथो में दराती लिये ,
कस के फेटा बाधे
गीत गाती धनिया
सपने नही देखती
हकीकत को मुठी में रखती है ।

सम्भाव्नायो से भरे '
धान के बेहन को
प्यार और वीश्वास से
दुलारती है '
ईश्वर से धान सी जीन्दगी मागती है ।
खूब हरे , भरे खूब लहलहाए ।




सोमवार, 27 अप्रैल 2009

औरते



सासों में ,
यादों में,
खवाबो में,
पर्दों में,
सपनो में,
परछाई में,
पत्थरों में
तन्हाइयो में,
खुबसूरत प्यारी लगती है औरते,
सच पूछो तो केवल व्ही बची है औरते।



तलाश


तलाश कभी मरती नही,
सदिया बीत जाने पर भी ,
किसी न किसी को बना कर पाथेय,
जीवीत रहती है,
वैसे ही जैसे
बीज कभी मरता नही
लौट लौट कर आता है ,
हरा भरा करता है धरती को
अनगिनत तलाशे जो डरी ,
सहमी और भूमीगत है ,
कभी न कभी पुरी होंगी ।
तब सोने का हीरण,
छलावा नही होगा ,
और दुनीया भर की औरते
मुस्कुरायेंगी......